रेरा कानून के तहत ब्याज का वैधानिक अधिकार निजी समझौते से खत्म नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि प्रमोटर और आवंटी (Allottee) के बीच हुआ कोई भी निजी समझौता या करार, रेरा अधिनियम, 2016 (RERA Act) के तहत मिलने वाले वैधानिक दायित्वों और अधिकारों पर भारी नहीं पड़ सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की पीठ ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें समझौते के बावजूद आवंटी को देरी के लिए ब्याज देने का आदेश दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि रेरा अधिनियम की धारा 18(1) के प्रावधान के तहत देरी के लिए ब्याज पाने का आवंटी का अधिकार अनिवार्य (Mandatory) है और इसे दबाव में हस्ताक्षर किए गए किसी “एकतरफा” समझौते के जरिए छोड़ा नहीं जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला लखनऊ के जानकीपुरम विस्तार में लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा शुरू की गई “सृष्टि अपार्टमेंट्स” परियोजना से संबंधित है। प्रतिवादी, सुषमा शुक्ला को 15 नवंबर, 2011 को 22,30,000 रुपये की अनुमानित लागत वाला एक फ्लैट आवंटित किया गया था। शर्तों के अनुसार, कब्जा 24 महीने के भीतर यानी 15 नवंबर, 2013 तक दिया जाना प्रस्तावित था।

कब्जा देने में देरी होने पर, आवंटी ने 18 सितंबर, 2018 को उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (यूपी रेरा) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कब्जा, पांच साल की देरी के लिए ब्याज और जीएसटी के संबंध में राहत की मांग की गई। इसके बाद, 5 दिसंबर, 2018 को पार्टियों के बीच एक निजी समझौता हुआ और 18 दिसंबर, 2018 को सेल डीड निष्पादित की गई।

7 मई, 2019 को नियामक प्राधिकरण ने देरी के ब्याज के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आवंटी ने समझौते में कहा था कि उसे कोई शिकायत नहीं है और वह परियोजना से संतुष्ट है। 4 जून, 2019 को भौतिक कब्जा सौंप दिया गया।

READ ALSO  पैंट की जिप ओपन करना और हाथ पकड़ना पोक्सो एक्ट के तहत अपराध नही: बॉम्बे हाई कोर्ट

नियामक प्राधिकरण के आदेश से असंतुष्ट होकर, आवंटी ने यूपी रियल एस्टेट अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील की। 1 अप्रैल, 2025 को ट्रिब्यूनल ने अपील स्वीकार करते हुए नियामक प्राधिकरण के आदेश को रद्द कर दिया। ट्रिब्यूनल ने एलडीए को 16 नवंबर, 2013 से 4 जून, 2019 तक MCLR + 1% की दर से ब्याज और 20,000 रुपये मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया। एलडीए ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (एलडीए) के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि पार्टियों के बीच समझौता हो चुका था, इसलिए ट्रिब्यूनल ने ब्याज देकर गलती की है। यह दलील दी गई कि रेरा अधिनियम की धारा 88 के तहत प्रावधान अन्य कानूनों के अतिरिक्त हैं, उनके अल्पीकरण में नहीं, और इस प्रकार यह समझौते का स्थान नहीं लेंगे। अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कृष्णा बहादुर बनाम पूर्णा थिएटर के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी पक्ष अपने अधिकारों का त्याग कर सकता है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने कानून के दो अहम सवालों पर विचार किया: “क्या कोई निजी अनुबंध/समझौता कानून के प्रावधानों को ओवरराइड कर सकता है?” और “क्या डॉटेड लाइन (बिंदुदार रेखा) पर हस्ताक्षर कराया गया समझौता वैध माना जा सकता है?”

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने रेरा अधिनियम की धारा 18 का विश्लेषण किया और कहा कि यदि आवंटी परियोजना से वापस नहीं हटता है, तो प्रमोटर पर देरी के हर महीने के लिए ब्याज देने का अनिवार्य वैधानिक दायित्व है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

READ ALSO  क्या यूपी वैट अधिनियम की धारा 2(एम) के तहत परिभाषित "माल" शब्द का दायरा केवल "कर योग्य सामान" तक सीमित किया जाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया

“ऐसे आवंटियों के लिए विधायी आदेश यह है कि वे यूनिट का कब्जा मिलने तक अपनी जमा राशि पर ब्याज के हकदार हैं। प्रमोटर पर ऐसे आवंटियों को ब्याज देने का अनिवार्य वैधानिक दायित्व डाला गया है… यदि प्रमोटर ब्याज का भुगतान करने के अनिवार्य दायित्व का पालन करने में विफल रहता है, तो वह रेरा अधिनियम, 2016 के अध्याय VIII के तहत दंडात्मक परिणामों के लिए जिम्मेदार होगा।”

एलडीए द्वारा जिस समझौते का हवाला दिया गया था, उस पर कोर्ट ने पाया कि वह एक “साइक्लोस्टाइल दस्तावेज” था जहां आवंटी को केवल “डॉटेड लाइन” पर हस्ताक्षर करना था। कोर्ट ने कहा:

“जाहिर है, एक व्यक्ति जिसने अपने सपनों के घर/फ्लैट के लिए जीवन भर की जमा-पूंजी लगा दी है, उसके पास बिल्डर से लड़ने की ताकत नहीं होती। उसके पास बिल्डर द्वारा तैयार किए गए समझौते पर, जहां ‘इसे लो या छोड़ दो’ (take it or leave it) की स्थिति होती है, हस्ताक्षर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह के समझौते आमतौर पर दबाव (duress) में निष्पादित किए जाते हैं।”

कोर्ट ने भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 का हवाला देते हुए कहा कि वैधानिक प्रावधानों को विफल करने के उद्देश्य से किया गया कोई भी समझौता शुरू से ही शून्य (void ab initio) होता है। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यूटेक प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ यूपी और पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गोविंदन राघवन के फैसलों पर भरोसा जताया, जिसमें एकतरफा शर्तों को अनुचित व्यापार व्यवहार माना गया है।

READ ALSO  चप्पू चला कर नदी पार करने वाली छात्राओं की दुर्दशा ने बॉम्बे हाईकोर्ट को हिलाकर रख दिया- जानिए विस्तार से

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा:

“इस प्रकार, प्रमोटर रेरा अधिनियम, 2016 के तहत अपनी जिम्मेदारियों/दायित्वों से पीछे नहीं हट सकता क्योंकि संविदात्मक शर्तें आवंटी के पक्ष में अधिनियम द्वारा बनाए गए अनिवार्य वैधानिक दायित्वों/अधिकारों को ओवरराइड नहीं कर सकती हैं।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और ट्रिब्यूनल के 1 अप्रैल, 2025 के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “कोई भी निजी अनुबंध/समझौता कानून के वैधानिक प्रावधानों द्वारा बनाए गए अधिकारों और दायित्वों पर प्रभावी नहीं हो सकता है।”

केस डीटेल्स:

केस टाइटल: लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम सुषमा शुक्ला

केस नंबर: रेरा अपील डिफेक्टिव नंबर – 125 ऑफ 2025

कोरम: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles