सरकारी अधिसूचना केवल आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन पर ही प्रभावी होगी, वेबसाइट पर अपलोड होने पर नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 के तहत केंद्र सरकार द्वारा जारी कोई भी अधिसूचना तभी कानून का बल प्राप्त करती है जब वह ‘आधिकारिक राजपत्र’ (Official Gazette) में प्रकाशित हो जाती है। न्यायालय ने कहा कि केवल आधिकारिक वेबसाइट पर अधिसूचना अपलोड करना उसे लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

जस्टिस पमिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि वेबसाइट पर अधिसूचना अपलोड करना आयातकों को बाध्य करने के लिए पर्याप्त नोटिस है। शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि विवादित अधिसूचना में उल्लिखित “अधिसूचना की तारीख” (date of notification) का अर्थ अनिवार्य रूप से आधिकारिक राजपत्र में इसके प्रकाशन की तारीख ही समझा जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के 21 दिसंबर, 2018 के एक सामान्य आदेश से उत्पन्न हुआ था, जिसके द्वारा विराज इम्पेक्स प्रा. लि. और अन्य आयातकों की रिट याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। अपीलकर्ता माइल्ड स्टील (mild steel) वस्तुओं के आयात और व्यापार में संलग्न हैं। फरवरी 2016 से पहले ये वस्तुएं स्वतंत्र रूप से आयात योग्य थीं।

29 जनवरी, 2016 और 4 फरवरी, 2016 के बीच, अपीलकर्ताओं ने चीन और दक्षिण कोरिया के निर्यातकों के साथ बिक्री अनुबंध किए। 5 फरवरी, 2016 को अपीलकर्ताओं ने विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के पक्ष में अटूट ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ (Irrevocable Letters of Credit) खोले।

उसी दिन, यानी 5 फरवरी, 2016 को विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने अपनी वेबसाइट पर अधिसूचना संख्या 38/2015-2020 अपलोड की, जिसमें निर्दिष्ट स्टील उत्पादों के लिए न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) लागू किया गया था। इस दस्तावेज पर यह लिखा था कि इसे “भारत के आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाना है।” यह अधिसूचना बाद में 11 फरवरी, 2016 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हुई।

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अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए तर्क दिया था कि चूंकि अधिसूचना 11 फरवरी, 2016 को राजपत्र में प्रकाशित हुई थी, इसलिए इसे पहले खोले गए ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ के तहत किए गए आयात पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस चुनौती को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि भले ही अधिसूचना प्रकाशन की तारीख से लागू हो, लेकिन 5 फरवरी, 2016 को इसे अपलोड करना उन आयातकों को बाध्य करने के लिए पर्याप्त नोटिस था जिनके ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ उस तारीख से पहले नहीं खुले थे।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि 11 फरवरी, 2016 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन से पहले अधिसूचना का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं था (non-est)। यह कहा गया कि विदेश व्यापार नीति (FTP) के पैरा 1.05(b) के साथ पढ़ी जाने वाली अधिसूचना के पैरा 2 के तहत, आयातक को प्रतिबंध लगाने की तारीख से पहले ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ खोलना चाहिए था। चूंकि प्रतिबंध 11 फरवरी, 2016 को लागू हुआ और ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ 5 फरवरी, 2016 को खोले गए थे, इसलिए उन्होंने छूट का दावा किया।

प्रतिवादियों (भारत संघ) ने तर्क दिया कि भले ही अधिसूचना 11 फरवरी, 2016 से प्रभावी हुई हो, लेकिन पैरा 2 के तहत लाभ केवल 5 फरवरी, 2016 से पहले दर्ज किए गए ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ तक सीमित था। उन्होंने दलील दी कि “अधिसूचना की तारीख” 5 फरवरी, 2016 ही रहनी चाहिए।

न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के तर्क और प्रतिवादियों की दलीलों को खारिज कर दिया। पीठ ने प्रत्यायोजित विधान (delegated legislation) के लिए प्रकाशन की अनिवार्यता पर जोर दिया।

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विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 की धारा 3 का हवाला देते हुए, न्यायालय ने नोट किया कि केंद्र सरकार को “आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित आदेश” द्वारा आयात और निर्यात को विनियमित करने का अधिकार है।

फैसला लिखते हुए जस्टिस अराधे ने कहा:

“कानून को बाध्यकारी होने के लिए पहले उसका अस्तित्व में होना आवश्यक है। और अस्तित्व में आने के लिए, इसे विधायिका द्वारा निर्धारित तरीके से ज्ञात कराया जाना चाहिए… राजपत्र में प्रकाशन की आवश्यकता एक दोहरे संवैधानिक उद्देश्य को पूरा करती है यानी (ए) यह कानून द्वारा शासित लोगों के लिए पहुंच और नोटिस सुनिश्चित करती है, और (बी) यह प्रत्यायोजित विधायी शक्ति के प्रयोग में जवाबदेही और गंभीरता सुनिश्चित करती है। राजपत्र में प्रकाशन की आवश्यकता केवल एक खाली औपचारिकता नहीं है। यह एक ऐसा कृत्य है जिसके द्वारा एक कार्यकारी निर्णय कानून में परिवर्तित हो जाता है।”

न्यायालय ने आगे कहा:

“यह स्पष्ट है कि 11.02.2016 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन से पहले अधिसूचना कानून का बल प्राप्त नहीं कर सकती थी। वास्तव में, अधिसूचना स्वयं यह घोषित करके अपनी अपूर्णता को स्वीकार करती है कि इसे ‘भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाना है’। यह स्वीकृति इस बात का प्रमाण है कि, जब तक ऐसा प्रकाशन नहीं हो जाता, अधिसूचना ने इरादे से दायित्व की दहलीज को पार नहीं किया था।”

पीठ ने कहा कि इसके विपरीत मानना “अप्रकाशित प्रत्यायोजित विधान को नागरिकों पर थोपने की अनुमति देगा,” जिसे न्यायालय ने पिछले निर्णयों में स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है।

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“अधिसूचना की तारीख” की व्याख्या के संबंध में, न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक बार जब यह मान लिया जाता है कि अधिसूचना केवल 11 फरवरी, 2016 को प्रभावी हुई, तो पैरा 2 में अभिव्यक्ति का अर्थ आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन की तारीख ही समझा जाना चाहिए।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और दिल्ली हाईकोर्ट के 21 दिसंबर, 2018 के फैसले को रद्द कर दिया।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला:

“हम तदनुसार यह मानते हैं कि अधिनियम की धारा 3 के तहत जारी अधिसूचना केवल आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन पर ही कानून का बल प्राप्त करती है। ‘इस अधिसूचना की तारीख’ अभिव्यक्ति का अर्थ अनिवार्य रूप से ऐसे प्रकाशन की तारीख होनी चाहिए।”

नतीजतन, अपीलकर्ता, जिन्होंने 11 फरवरी, 2016 से पहले ‘लेटर ऑफ क्रेडिट’ खोले थे और FTP के पैरा 1.05(b) के तहत प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का अनुपालन किया था, संक्रमणकालीन प्रावधान (transitional provision) के लाभ के हकदार माने गए। अधिसूचना द्वारा शुरू किया गया न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) उनके आयात पर लागू नहीं किया जा सकता।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: विराज इम्पेक्स प्रा. लि. बनाम भारत संघ और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (@ एस.एल.पी. (सी) संख्या 1979 वर्ष 2019)
  • कोरम: जस्टिस पमिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

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