दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कमर्शियल कोर्ट (वाणिज्यिक न्यायालय) यह पाता है कि को कोई मुकदमा कमर्शियल कोर्ट एक्ट, 2015 के तहत “वाणिज्यिक विवाद” (Commercial Dispute) की श्रेणी में नहीं आता है, तो उसे मुकदमे को खारिज (Dismiss) नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, कोर्ट को कानूनी रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 10 के तहत वादपत्र (Plaint) को वापस करना चाहिए, ताकि उसे उचित मंच/अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने कहा कि क्षेत्राधिकार की कमी के कारण मुकदमे को खारिज करना वादी के मूल दावों पर न्याय के दरवाजे बंद करने जैसा है, जबकि सही प्रक्रिया यह है कि मामले को सक्षम न्यायालय में स्थानांतरित करने की सुविधा दी जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील प्रमोद कुमार (अपीलकर्ता) द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने मैसर्स गैमन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड (प्रतिवादी) के साथ 27 वर्षों से अधिक समय तक सेवा की थी और डिप्टी जनरल मैनेजर (सिविल) के पद तक पहुंचे थे। अपीलकर्ता को 1992 में नियुक्त किया गया था। 3 फरवरी 2020 को, उन्होंने अपने बड़े बेटे की शादी में शामिल होने के लिए अर्जित अवकाश (Earned Leave) के लिए आवेदन किया। हालांकि, 6 फरवरी 2020 को प्रतिवादी कंपनी ने 2012 की संशोधित शर्तों के प्रावधान 14(a) का हवाला देते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।
बर्खास्तगी के बाद, अपीलकर्ता ने अपने बकाये का पूर्ण और अंतिम निपटान मांगा। उन्होंने कुल 4,10,184 रुपये की बकाया राशि का दावा किया, जिसमें शामिल थे:
- नोटिस के बदले दो महीने के मूल वेतन का शेष – 1,00,000 रुपये।
- 153 दिनों के अर्जित अवकाश के नकदीकरण के लिए – 2,55,000 रुपये।
- लंबित यात्रा व्यय बिलों के लिए – 5,184 रुपये।
- लैपटॉप सुरक्षा जमा की वापसी के लिए – 50,000 रुपये।
कानूनी नोटिस के बावजूद, प्रतिवादी ने बकाये का निपटान नहीं किया। नतीजतन, अपीलकर्ता ने कमर्शियल कोर्ट के समक्ष वसूली का मुकदमा दायर किया। 30 अप्रैल 2024 को अपने निर्णय में, कमर्शियल कोर्ट ने माना कि यह विवाद अनिवार्य रूप से एक कर्मचारी और निजी नियोक्ता के बीच सेवा-संबंधी वसूली का मामला है। यह फैसला सुनाते हुए कि यह कमर्शियल कोर्ट एक्ट की धारा 2(1)(c) के तहत “वाणिज्यिक विवाद” के मानदंडों को पूरा नहीं करता है, कमर्शियल कोर्ट ने मुकदमे को खारिज कर दिया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष केवल कानूनी प्रक्रिया को चुनौती दी। उनके वकील ने तर्क दिया कि भले ही कमर्शियल कोर्ट ने विवाद को गैर-वाणिज्यिक मानकर सही किया हो, लेकिन मुकदमे को खारिज करके उसने कानूनन गलती की है। यह तर्क दिया गया कि विषय-वस्तु क्षेत्राधिकार (Subject-matter jurisdiction) की कमी पाने पर, कोर्ट की शक्ति CPC के आदेश VII नियम 10 के तहत वादपत्र वापस करने तक सीमित थी। वकील ने कहा कि “गलत मंच” की त्रुटि के कारण मुकदमे को खारिज करने से न्याय की हत्या हुई है।
वहीं, प्रतिवादी के वकील ने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि चूंकि अपीलकर्ता ने गैर-वाणिज्यिक मामले के लिए एक विशेष कमर्शियल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, इसलिए उस विशिष्ट मंच के समक्ष मुकदमा चलने योग्य न होने के कारण इसे खारिज करना स्वाभाविक परिणाम था।
न्यायालय का विश्लेषण और तर्क
हाईकोर्ट ने इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या कोई न्यायालय, यह पाने पर कि विवाद “गैर-वाणिज्यिक” है और उसे क्षेत्राधिकार नहीं है, मुकदमे को खारिज कर सकता है या उसे वादपत्र वापस करना अनिवार्य है।
विवाद की प्रकृति पर
पीठ ने विवाद की प्रकृति के संबंध में कमर्शियल कोर्ट के निष्कर्ष की पुष्टि की। हाईकोर्ट ने कहा:
“न्यायिक सर्वसम्मति और कानून के स्पष्ट अध्ययन से यह पता चलता है कि एक कर्मचारी द्वारा निजी नियोक्ता से वेतन या टर्मिनल लाभों की साधारण वसूली ‘व्यापारियों, बैंकरों, फाइनेंसरों और ट्रेडर्स’ या अन्य निर्दिष्ट वाणिज्यिक लेनदेन की श्रेणियों में नहीं आती है।”
खारिज बनाम वादपत्र की वापसी (Dismissal vs. Return of Plaint)
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि इस निष्कर्ष के प्रक्रियात्मक परिणाम में कमर्शियल कोर्ट ने गलती की। ‘खारिज करने’ और ‘वादपत्र वापस करने’ के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए, कोर्ट ने टिप्पणी की:
“हमारी राय में, किसी मुकदमे को ‘खारिज’ करना गुणों-दोषों (Merits) पर या किसी बाधा (जैसे रेस ज्यूडिकाटा या सीमा) पर अंतिम निर्णय है जो दावे को फिर से सुने जाने से रोकता है। इसके विपरीत, ‘वादपत्र की वापसी’ एक प्रक्रियात्मक तंत्र है, जिसका उपयोग तब किया जाता है जब कोई न्यायालय पाता है कि वह मामले की सुनवाई के लिए सही मंच नहीं है। मुकदमे को खारिज करके, कमर्शियल कोर्ट ने क्षेत्राधिकार संबंधी दोष को वाद के कारण (Cause of action) की विफलता मान लिया।”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि एक वादी को “सिर्फ इसलिए उपचारहीन (remediless) नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि उसने अदालत का गलत दरवाजा खटखटाया है, खासकर तब जब दावा 27 साल की सेवा के बाद पर्याप्त टर्मिनल लाभों से जुड़ा हो।”
न्यायिक मिसालें
हाईकोर्ट ने अंबालाल साराभाई एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम के.एस. इंफ्रास्पेस एलएलपी (2020) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया था कि यदि विवाद वाणिज्यिक नहीं है, तो:
“कमर्शियल कोर्ट को वादपत्र वापस करना चाहिए और क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायालय के समक्ष इसकी प्रस्तुति के लिए एक तारीख इंगित करनी चाहिए।”
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया और 30 अप्रैल 2024 के फैसले को रद्द कर दिया। पीठ ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- बहाली: अपीलकर्ता द्वारा दायर मुकदमे को उसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाता है।
- वादपत्र की वापसी: कमर्शियल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह CPC के आदेश VII नियम 10A के तहत अपीलकर्ता को वादपत्र वापस करे और उसे सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की तारीख बताए।
- साक्ष्य का उपयोग: यह स्वीकार करते हुए कि मूल कार्यवाही में दलीलें पेश की गई थीं और गवाही दर्ज की गई थी, कोर्ट ने निर्देश दिया कि नए सिरे से कार्यवाही (De novo proceedings) में देरी से बचने के लिए, वकीलों की सहमति से, सक्षम न्यायालय उन दलीलों और साक्ष्यों (दस्तावेजी और मौखिक) का उपयोग कर सकता है जो पहले ही पेश किए जा चुके हैं।
पक्षों को 3 फरवरी 2026 को संबंधित कमर्शियल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: प्रमोद कुमार बनाम मैसर्स गैमन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड
- केस नंबर: RFA(COMM) 348/2024
- कोरम: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन

