तलाक के बिना दूसरी शादी शून्य, ‘पत्नी’ BNS के तहत क्रूरता का केस नहीं कर सकती: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पहली शादी के कायम रहते हुए दूसरी शादी की गई है और वह कानूनन शून्य (Void) है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 85 के तहत वैवाहिक क्रूरता का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि अलग रहने वाले ससुराल वालों के खिलाफ लगाए गए अस्पष्ट और सामान्य आरोप कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

पति के रिश्तेदारों (याचिकाकर्ताओं) ने बेगूसराय के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा 3 जनवरी, 2025 को पारित आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। निचली अदालत ने उनके खिलाफ BNS की धारा 85 (क्रूरता), 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 118(1) (खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना) और 191(2) (दंगा) के तहत संज्ञान लिया था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसने आरोपी (पति) के साथ बेगूसराय के काली मंदिर में शादी की थी। उसका कहना था कि पति को यह पता था कि वह तलाकशुदा है और उसका पिछली शादी से एक नाबालिग बेटा भी है, इसके बावजूद उसने शादी की। आरोपों के अनुसार, शादी के बाद पति और उसके रिश्तेदारों ने उसे जातिसूचक गालियां दीं और मारपीट की। विशेष रूप से, यह आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता नंबर 2 (देवर) ने उसका गला दबाने की कोशिश की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि यह आपराधिक कार्यवाही कानून का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप “अस्पष्ट और सामान्य” हैं और किसी भी याचिकाकर्ता द्वारा क्रूरता का कोई विशिष्ट कृत्य नहीं बताया गया है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें वैवाहिक विवादों में पूरे परिवार को फंसाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई थी।

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बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह था कि अभियोजन का आधार ही गलत है क्योंकि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा थी और उसने अपने पहले पति से तलाक का कोई दस्तावेज (डिक्री) पेश नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट के डॉली रानी बनाम मनीष कुमार चंचल (2025) के फैसले का हवाला देते हुए वकील ने तर्क दिया कि वैध विवाह के अभाव में, आरोपी के साथ कथित शादी शुरू से ही शून्य (Void-ab-initio) है, इसलिए वैवाहिक अपराधों के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

वहीं, राज्य सरकार के वकील ने निचली अदालत के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने सभी सबूतों पर विचार करने के बाद ही संज्ञान लिया था।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रुद्र प्रकाश मिश्रा ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप काफी हद तक “अस्पष्ट और सामान्य” प्रकृति के हैं। कोर्ट ने कहा कि केवल उत्पीड़न की कहानी गढ़ने के अलावा, शिकायत में किसी भी याचिकाकर्ता की विशिष्ट भूमिका या क्रूरता की किसी घटना का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“भौतिक विवरणों का अभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर वैवाहिक विवादों में जहां पूरे परिवार को फंसाने की प्रवृत्ति को अदालतों ने देखा है और इसकी आलोचना की है।”

याचिकाकर्ता नंबर 2 द्वारा गला दबाने के आरोप पर कोर्ट ने पाया कि इसके समर्थन में कोई मेडिकल रिपोर्ट या समकालीन दस्तावेज पेश नहीं किया गया। यह आरोप भी शुरूआती शिकायत में नहीं था, बल्कि जांच के दौरान पहली बार सामने आया, जिसे कोर्ट ने संदिग्ध माना।

फैसले का सबसे अहम पहलू शादी की वैधता पर था। कोर्ट ने नोट किया कि शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया है कि वह पहले से शादीशुदा थी और उसका एक बच्चा है, लेकिन तलाक का कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है।

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा:

“मौजूदा शादी के विघटन (Dissolution) के अभाव में, आरोपी सुमित कुमार के साथ कथित दूसरी शादी कानून की नजर में शुरू से ही शून्य है।”

BNS, 2023 की धारा 85 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया:

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“भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के लिए दो आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है: पहला, कानूनी रूप से वैध वैवाहिक संबंध; और दूसरा, उस संबंध से उत्पन्न क्रूरता। इस मामले में ये दोनों ही तत्व नदारद हैं।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया है कि वह याचिकाकर्ताओं से लगभग तीन साल से अलग रह रही थी। कोर्ट ने कहा कि जब साथ रहने या सार्थक बातचीत का ही अभाव है, तो ससुराल वालों द्वारा क्रूरता का आरोप स्वाभाविक रूप से असंभव प्रतीत होता है।

फैसला

पटना हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संज्ञान लेने वाला आदेश बिना उचित विचार किए पारित किया गया था और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय का हनन होगा। भजन लाल मामले के सिद्धांतों को लागू करते हुए, कोर्ट ने पाया कि आरोपों से कोई अपराध नहीं बनता।

नतीजतन, याचिका को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने बेगूसराय के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 3 जनवरी, 2025 को पारित संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।

केस डिटेल:

  • केस टाइटल: मंजू देवी और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 36935 ऑफ 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति रुद्र प्रकाश मिश्रा

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