इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि धारा 127 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत आदेश पारित होने से पहले बेटा वयस्क हो चुका है, तो वह बढ़े हुए भरण-पोषण का हकदार नहीं है। कोर्ट ने बेटे के पक्ष में भरण-पोषण राशि बढ़ाने के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, पत्नी के भरण-पोषण में की गई वृद्धि को कोर्ट ने बरकरार रखा है और इसे “अत्यधिक” मानने से इनकार कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ल की पीठ ने मोज्ज़म अली द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक (पति) ने प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, भदोही द्वारा 4 अगस्त, 2023 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। परिवार न्यायालय ने एक पक्षीय (ex-parte) आदेश पारित करते हुए धारा 127 CrPC के तहत विपक्षी संख्या 2 (पत्नी) का भरण-पोषण 1,000 रुपये से बढ़ाकर 6,000 रुपये प्रतिमाह और विपक्षी संख्या 3 (बेटे) का भरण-पोषण 500 रुपये से बढ़ाकर 4,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था।
आवेदक ने धारा 128 CrPC के तहत शुरू की गई वसूली की कार्यवाही को भी चुनौती दी थी।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक के अधिवक्ता वहाज अहमद सिद्दीकी ने तर्क दिया कि निचली अदालत का आदेश एक पक्षीय था और आवेदक को नोटिस की तामील कानूनन सही तरीके से नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि पंजीकृत डाक पर यह टिप्पणी थी कि प्राप्तकर्ता बाहर रहता है, जिसे पर्याप्त तामील नहीं माना जाना चाहिए।
इस मामले में मुख्य कानूनी तर्क बेटे की उम्र को लेकर उठाया गया। अधिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार बेटे की जन्मतिथि 7 जनवरी, 2005 है। इस आधार पर, वह 5 जनवरी, 2023 को ही वयस्क हो चुका था। यह तर्क दिया गया कि 4 अगस्त, 2023 को जब भरण-पोषण बढ़ाने का आदेश पारित किया गया, तब बेटा पहले ही बालिग हो चुका था, जिसे निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया।
भरण-पोषण की राशि के मुद्दे पर आवेदक ने कहा कि उस पर पांच बच्चों की जिम्मेदारी है और बढ़ी हुई राशि उसकी क्षमता से बाहर है।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद जन्म प्रमाण पत्र का संज्ञान लिया और पाया कि धारा 127 CrPC के तहत आदेश पारित होने से पहले ही विपक्षी संख्या 3 (बेटा) वयस्क हो चुका था।
बेटे के भरण-पोषण के संबंध में न्यायमूर्ति शुक्ल ने कहा:
“इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि विपक्षी संख्या 3 ने धारा 127 CrPC के तहत आदेश पारित होने से पहले ही वयस्कता की आयु प्राप्त कर ली है, जैसा कि इस आवेदन के साथ संलग्न जन्म प्रमाण पत्र से स्पष्ट है। विपक्षी संख्या 3 से संबंधित विवादित आदेश को एतद्द्वारा रद्द किया जाता है।”
हालाँकि, पत्नी (विपक्षी संख्या 2) के भरण-पोषण में वृद्धि को कोर्ट ने सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान समय और महंगाई को देखते हुए पत्नी के लिए 6,000 रुपये की राशि “अत्यधिक प्रतीत नहीं होती है”। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आवेदक ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि वह कमाने में असमर्थ है या उसकी आय कम है।
कोर्ट ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश द्वारा पत्नी के भरण-पोषण में वृद्धि का निर्णय “न्यायोचित और कानूनी” है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- विपक्षी संख्या 3 (बेटे) को दिया गया बढ़ा हुआ भरण-पोषण रद्द कर दिया गया।
- आवेदक को निर्देश दिया गया कि वह 4 अगस्त, 2023 के आदेश के अनुसार पत्नी (विपक्षी संख्या 2) को मासिक भरण-पोषण का भुगतान जारी रखे।
- भरण-पोषण की बकाया राशि (एरियर) का भुगतान नियमित भरण-पोषण के साथ 12 समान मासिक किस्तों में किया जाएगा।
केस डीटेल्स (Case Details):
- केस का नाम: मोज्ज़म अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
- केस संख्या: आवेदन धारा 528 बीएनएसएस (APPLICATION U/S 528 BNSS) संख्या – 7530/2025
- बेंच: न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ल

