राजस्थान हाईकोर्ट: डायरी में गलत तारीख नोट करने के कारण खारिज हुआ 37 साल पुराना मुकदमा बहाल, वादी को 25 पेड़ लगाने का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में 37 साल पुराने बेदखली के मुकदमे (Eviction Suit) को फिर से बहाल कर दिया है, जिसे वादी द्वारा सुनवाई की गलत तारीख नोट कर लेने के कारण ‘डिफ़ॉल्ट’ में खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने तकनीकी आधारों पर न्याय को बाधित न करने के सिद्धांत पर जोर देते हुए अपील स्वीकार की, लेकिन साथ ही वादी पर 10,000 रुपये का हर्जाना लगाया और ‘जनहित’ में 25 पौधे लगाने की अनूठी शर्त भी रखी।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश संख्या-4, जयपुर महानगर द्वारा 30 जुलाई 2019 को पारित आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मुकदमे को बहाल करने (Restoration) की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद वर्ष 1989 का है, जब अपीलकर्ता-वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ बेदखली और ‘मेस्ने प्रॉफिट’ (mesne profit) के लिए मुकदमा दायर किया था। मामले में गवाही और बहस का दौर चल रहा था। विवाद 21 सितंबर 2010 की कार्यवाही को लेकर खड़ा हुआ, जब मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर 2010 के लिए तय की गई थी।

वादी का कहना था कि “अनजाने में हुई गलती” के कारण डायरी में अगली तारीख 25 अक्टूबर की जगह 25 नवंबर 2010 नोट कर ली गई। नतीजतन, जब 25 अक्टूबर को कोर्ट में मामला पुकारा गया, तो वादी पक्ष से कोई उपस्थित नहीं हुआ और कोर्ट ने मुकदमा खारिज (Dismiss in default) कर दिया।

इसके बाद वादी ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 9 नियम 9 के तहत मुकदमा बहाली और परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) की धारा 5 के तहत देरी माफी की अर्जी लगाई। वादी ने बताया कि वे निजी काम से शहर से बाहर थे, इसलिए अर्जी लगाने में थोड़ी देरी हुई। निचली अदालत ने देरी के आधार पर अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता मो. अनीस ने तर्क दिया कि तारीख पर उपस्थित न होना जानबूझकर नहीं था, बल्कि डायरी में गलत तारीख लिखने की “सद्भाविक भूल” (Bona fide mistake) थी। उन्होंने कहा कि देरी मामूली थी और उसका कारण वादी का शहर से बाहर होना था। उन्होंने जोर देकर कहा कि तकनीकी कारणों से वादी को न्याय से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और मामले का फैसला गुण-दोष (Merits) के आधार पर होना चाहिए।

दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील समर प्रताप सिंह नरुका और लोकेश तिवारी ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि वादी ने अनुपस्थिति का कोई ठोस कारण नहीं बताया और बहाली की अर्जी भी बिना किसी उचित कारण के देरी से दायर की गई थी।

हाईकोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वादी द्वारा गलत तारीख (25 नवंबर) नोट करने की दलील को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देरी के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा:

“इस न्यायालय की सुविचारित राय में, देरी इतनी अधिक नहीं थी जिसे घातक या लंबी माना जा सके। थोड़ी देरी हुई थी, जिसे वादी ने संतोषजनक ढंग से समझाया है, और इसलिए निचली अदालत ने अर्जी खारिज करके त्रुटि की है।”

कोर्ट ने कहा कि मुकदमे में बेदखली से जुड़े कानून और तथ्यों के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं, जिनका फैसला गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए, न कि तकनीकी आधार पर खारिज करके।

पर्यावरण संरक्षण के लिए अनूठी पहल

मुकदमा बहाल करते हुए हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को भी न्याय प्रक्रिया से जोड़ा। कोर्ट ने वादी को निर्देश दिया कि वह केवल हर्जाना ही न दे, बल्कि समाज की भलाई के लिए पेड़ भी लगाए। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

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“वादी को 25 पौधे लगाने का निर्देश देने वाला यह आदेश बड़े पैमाने पर जनता के हित और व्यापक सार्वजनिक भलाई (Greater Public Good) के लिए है। पेड़ लगाना एक उचित पहल है क्योंकि यह दशकों और सदियों तक शहर और आसपास के समुदाय को लाभ प्रदान करेगा। भावी पीढ़ियों को स्वच्छ और ऑक्सीजन युक्त वातावरण का लाभ मिलेगा।”

फैसला और शर्तें

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 30 जुलाई 2019 के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। हालांकि, मुकदमे की बहाली के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित सख्त शर्तें लगाईं:

  1. हर्जाना: वादी को अगली सुनवाई की तारीख या उससे पहले प्रतिवादियों को 10,000 रुपये का भुगतान करना होगा।
  2. वृक्षारोपण: वादी को किसी सार्वजनिक क्षेत्र में 25 छायादार पौधे/वृक्ष लगाने होंगे।
  3. शपथ पत्र: वादी को इन पौधों की तस्वीरें और इस आशय का शपथ पत्र (Undertaking) निचली अदालत में पेश करना होगा कि वे इन पौधों की तब तक देखभाल करेंगे जब तक वे बड़े नहीं हो जाते या जब तक मुकदमे का अंतिम फैसला नहीं हो जाता।
  4. रिपोर्ट: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वादी इन शर्तों का पालन करने में विफल रहते हैं, तो निचली अदालत इसकी रिपोर्ट हाईकोर्ट को करेगी।
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मामला 1989 से (37 साल से अधिक समय से) लंबित है, इसे देखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन (Adjournment) दिए बिना मामले का निस्तारण शीघ्रता से करे। दोनों पक्षों को 16 फरवरी 2026 को निचली अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: श्रीमती रसीदन (मृतक) व अन्य बनाम श्रीमती नूरजहां (मृतक) व अन्य
  • केस नंबर: एस.बी. सिविल विविध अपील संख्या 4812/2019
  • कोरम: जस्टिस अनूप कुमार ढंड
  • वकील (अपीलकर्ता): श्री मोहम्मद अनीस
  • वकील (प्रतिवादी): श्री समर प्रताप सिंह नरुका और श्री लोकेश तिवारी (वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एम.एम. रंजन के लिए)

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