आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने ‘श्री पोथुलुरी वीर ब्रह्मेन्द्र स्वामी मठ’ की संपत्ति पर दावा करने वाले व्यक्तियों द्वारा दायर एक अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल उपनाम (Surname) में ‘मठ’ (Matam) शब्द की समानता होने से मठ की संपत्ति वादी की पैतृक संपत्ति नहीं बन जाती।
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने अपने फैसले में दोहराया कि राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि (Entry) स्वामित्व प्रदान नहीं करती है और “कब्जा स्वामित्व का अनुसरण करता है” (Possession follows title) की अवधारणा को बिना वैध कब्जे और स्वामित्व के प्रमाण के लागू नहीं किया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील ‘मठ अशोक कुमार’ और अन्य (अपीलकर्ता/वादी) द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने तृतीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, कुरनूल के 28 जुलाई 2011 के फैसले और डिक्री को चुनौती दी थी। अपीलकर्ताओं ने आमुरु और नरसापुरम गांवों में स्थित विशिष्ट संपत्तियों के संबंध में स्वामित्व की घोषणा (Declaration of Title) और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करते हुए एक मुकदमा (O.S.No.6 of 2004) दायर किया था।
वादी का दावा था कि उनके परिवार का उपनाम ‘मठ’ है और उनके पूर्वज ‘मठ वीर ब्रह्मम स्वामी’ थे। उनका तर्क था कि अनुसूची संपत्तियां उनकी पैतृक पारिवारिक संपत्तियां हैं, जिन पर वे खेती कर रहे थे। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी किए गए सिस्ट रसीदें (Cist receipts) और पट्टादार पासबुक का हवाला दिया।
दूसरे प्रतिवादी, वीर ब्रह्मम मठ (इसके प्रबंधक द्वारा प्रतिनिधित्व) ने मुकदमे का विरोध किया। उनका तर्क था कि संपत्ति “श्री पोथुलुरी वीर ब्रह्मेन्द्र स्वामी मठ” (एक धार्मिक संस्था) की है। उन्होंने कहा कि वादी केवल मठ की सेवा से जुड़े नाम ‘मठ’ का लाभ उठा रहे थे और वे मालिक नहीं थे। ट्रायल कोर्ट ने यह मानते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था कि वादी यह साबित करने में विफल रहे कि संपत्ति उनके पूर्वजों की थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं का पक्ष: अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी. वीरा रेड्डी ने तर्क दिया कि वादी का उपनाम ‘मठ’ है और उन्होंने स्वामित्व के प्रमाण के रूप में सिस्ट रसीदें (Exs.A1 से A28) और पट्टादार पासबुक (Exs.A29 से A32) पर भरोसा किया। उनका तर्क था कि स्वामित्व को गलत साबित करने का भार प्रतिवादियों पर था।
वकील ने आगे तर्क दिया कि दूसरे प्रतिवादी ने अपने लिखित बयान में वादी द्वारा खेती किए जाने की बात स्वीकार की थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चूंकि प्रतिवादियों ने अतिक्रमण का आरोप लगाने के बावजूद एंडोमेंट्स एक्ट की धारा 83 के तहत कार्यवाही शुरू नहीं की थी, इसलिए वादी के कब्जे को संरक्षित किया जाना चाहिए।
प्रतिवादियों का पक्ष: राज्य (प्रथम प्रतिवादी) के सहायक सरकारी प्लीडर ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि संपत्ति मठ की है। उन्होंने तर्क दिया कि वादी ने अपने पिता के नाम का लाभ उठाकर पासबुक बनवा ली थीं और स्वामित्व साबित करने का भार वादी पर था, न कि बचाव पक्ष की कमजोरी पर।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने स्वामित्व की घोषणा के संबंध में साक्ष्य और कानूनी सिद्धांतों का विस्तृत विश्लेषण किया।
1. सबूत का भार (Burden of Proof): सुप्रीम कोर्ट के फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वासवी कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड (2014) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा:
“यह स्थापित कानून है कि स्वामित्व की घोषणा के मुकदमे में, इस तरह की घोषणा देने के लिए एक स्पष्ट मामला बनाने और स्थापित करने का भार हमेशा वादी पर होता है और प्रतिवादियों द्वारा स्थापित मामले की कमजोरी, यदि कोई हो, तो वादी को राहत देने का आधार नहीं होगी।”
पीठ ने नोट किया कि वादी यह साबित करने के लिए कोई पंजीकृत दस्तावेज या राजस्व अडंगल (revenue adangal) पेश करने में विफल रहे कि संपत्ति मूल रूप से उनके दावा किए गए पूर्वज, मठ वीर ब्रह्मम स्वामी की थी।
2. उपनाम ‘मठ’ और स्वामित्व: कोर्ट ने इस तर्क को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया कि उपनाम ‘मठ’ का अर्थ मठ की संपत्ति का स्वामित्व है। फैसले में कहा गया:
“केवल इसलिए कि ‘मठ’ नाम सामान्य है, घोषणा के लिए डिक्री नहीं दी जा सकती… उपनाम ‘मठ’ (Matam) की मात्र समानता ‘मठ’ (Mutt) के नाम पर दर्ज संपत्ति को वादी की पैतृक संपत्ति नहीं बना देगी।”
3. राजस्व प्रविष्टियां स्वामित्व का प्रमाण नहीं: कोर्ट ने नगर पालिका बनाम जगत सिंह (1995) और सूरज भान बनाम वित्तीय आयुक्त (2007) पर भरोसा करते हुए दोहराया कि राजस्व रिकॉर्ड स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं।
“राजस्व अभिलेखों में केवल नामांतरण (mutation) से कोई हक नहीं मिलता और न ही यह हक का प्रमाण है।”
4. कब्जा स्वामित्व का अनुसरण करता है (Possession follows title): अपीलकर्ताओं ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 113) के तहत presumpion (उपधारणा) का आह्वान करने का प्रयास किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह उपधारणा केवल तभी लागू होती है जब तथ्यों से पता चलता है कि किसी भी पक्ष में कोई स्वामित्व निहित नहीं है।
“कब्जा स्वामित्व का अनुसरण करता है, यह साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 के तहत उठाई जा सकने वाली उपधारणा है… इस तरह की उपधारणा को उठाने के लिए, कब्जा किसी भी समय स्वामित्व (title) के साथ होना चाहिए… चूंकि संपत्ति दूसरे प्रतिवादी (बंदोबस्ती आयुक्त) के नाम पर दर्ज है (Exs.X7 और X8), इसलिए ‘कब्जा स्वामित्व का अनुसरण करता है’ की उपधारणा को आकर्षित या लागू नहीं किया जा सकता…”
निर्णय
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को बरकरार रखा, यह देखते हुए कि दूसरे प्रतिवादी ने टाइटल डीड और पट्टादार पासबुक (Exs.B7 और B8) पेश किए थे, जो यह दर्शाते हैं कि संपत्ति एंडोमेंट कमिश्नर/मठ की है।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“वादी, स्वामित्व का दस्तावेज़ प्रस्तुत करके अपना हक (Title) स्थापित करने में विफल रहे हैं, इसलिए घोषणा का मुकदमा सफल नहीं हो सकता।”
तदनुसार, बिना किसी लागत आदेश के अपील खारिज कर दी गई।
केस डिटेल्स:
केस टाइटल: मठ अशोक कुमार और अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, जिला कलेक्टर, कुरनूल और अन्य के माध्यम से
केस संख्या: फर्स्ट अपील नंबर 609 ऑफ 2011
कोरम: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम

