सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी समिट या सम्मेलन के लिए वक्ताओं (Speakers) को बुलाने हेतु अंतरराष्ट्रीय बुकिंग एजेंटों को भुगतान की गई फीस पर ‘इवेंट मैनेजमेंट सर्विस’ के तहत सर्विस टैक्स नहीं लगाया जा सकता है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (CESTAT) के आदेश को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि किसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए व्यक्तियों को बुक करने के अनुबंधों को सामान्य समझ में ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के रूप में नहीं देखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या एचटी मीडिया लिमिटेड द्वारा बुकिंग एजेंटों के माध्यम से व्यक्तित्वों और वक्ताओं को दी गई फीस, वित्त अधिनियम, 1994 की धारा 65(105)(zu) के तहत परिभाषित “इवेंट मैनेजमेंट सर्विस” के दायरे में आती है और क्या इस पर रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के तहत सर्विस टैक्स लागू होता है। कोर्ट ने अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि वक्ताओं को बुक करने की गतिविधि किसी कार्यक्रम की योजना बनाने, प्रचार करने या आयोजन करने के समान नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, एचटी मीडिया लिमिटेड, वार्षिक “हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट” का आयोजन करता है। भारत के बाहर से प्रमुख वक्ताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए, अपीलकर्ता ने वाशिंगटन स्पीकर्स ब्यूरो और हैरी वॉकर एजेंसी जैसे बुकिंग एजेंटों के साथ अनुबंध किया। इन एजेंटों ने मिस्टर टोनी ब्लेयर, मिस्टर जेरी लाइनेंजर और मिस्टर अल गोर जैसे वक्ताओं को बुक किया।
राजस्व विभाग (Revenue Department) ने इन बुकिंग एजेंटों को दी गई फीस पर “इवेंट मैनेजमेंट सर्विस” की श्रेणी के तहत सर्विस टैक्स लगाने का प्रस्ताव करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया। न्यायनिर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) ने मांग की पुष्टि की। अपील पर, सेसटाट (CESTAT) ने विस्तारित अवधि (extended period of limitation) की मांग को रद्द कर दिया लेकिन सामान्य अवधि के लिए मांग को बरकरार रखा और माना कि अपीलकर्ता “इवेंट मैनेजमेंट सर्विस” के तहत टैक्स का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से दलीलें: एचटी मीडिया के वकील श्री अशोक ढींगरा ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल का मांग की पुष्टि करना गलत था। उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु प्रस्तुत किए:
- एजेंट केवल “लेक्चर बुकिंग एजेंट” थे और उन्होंने इवेंट के प्रबंधन के संबंध में अपीलकर्ता को कोई सेवा प्रदान नहीं की।
- धारा 65(105)(zu) के तहत आने के लिए, सेवा प्रदाता को एक “इवेंट मैनेजर” होना चाहिए जो किसी कार्यक्रम की योजना, प्रचार, आयोजन या प्रस्तुति में लगा हो।
- 8 अगस्त, 2002 के टीआरयू (TRU) सर्कुलर का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि एक इवेंट मैनेजर से स्थल (venue), सजावट, ध्वनि, प्रकाश, सुरक्षा और प्रचार का प्रबंधन करने की अपेक्षा की जाती है। बुकिंग एजेंटों ने इनमें से कोई भी कार्य नहीं किया।
- एजेंटों ने समिट के संबंध में कोई परामर्श (consultation) भी प्रदान नहीं किया।
राजस्व विभाग की ओर से दलीलें: राजस्व विभाग के वकील श्री वी. चंद्रशेखर भारती ने टैक्स मांग का बचाव करते हुए तर्क दिया कि:
- वक्ता समिट का मुख्य हिस्सा हैं और उनके बिना कार्यक्रम का कोई महत्व नहीं होगा।
- प्रतिफल (consideration) के बदले वक्ताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करके, बुकिंग एजेंटों ने समिट की योजना, प्रचार, आयोजन या प्रस्तुति के संबंध में सेवा प्रदान की है।
- इसलिए, एजेंटों ने “इवेंट मैनेजर्स” के रूप में कार्य किया और वे धारा 65(105)(zu) के तहत टैक्स के लिए उत्तरदायी हैं।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने वित्त अधिनियम की धारा 65(41) के तहत “इवेंट मैनेजर” और धारा 65(40) के तहत “इवेंट मैनेजमेंट” की परिभाषाओं की जांच की। कोर्ट ने पाया कि समझौते सख्ती से एक विशेष वक्ता को बुक करने और यात्रा, आवास और भाषण के कार्यक्रम जैसी व्यवस्थाओं को रेखांकित करने के लिए थे।
सेवाओं की प्रकृति: पीठ ने अपने आदेश में कहा, “अनुबंधों की प्रकृति और एजेंटों द्वारा दी गई घोषणा स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि ऐसे एजेंटों द्वारा निर्धारिती (assessee) को दी गई सेवाएं निर्धारिती द्वारा आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रम के लिए वक्ताओं की बुकिंग की प्रकृति में थीं… ऐसी सेवाओं को ‘इवेंट मैनेजमेंट सर्विस’ के बराबर नहीं माना जा सकता है, जिसे वैधानिक रूप से किसी कला, मनोरंजन, व्यवसाय, खेल, विवाह या किसी अन्य कार्यक्रम की योजना, प्रचार, आयोजन या प्रस्तुति के संबंध में प्रदान की गई किसी भी सेवा के रूप में परिभाषित किया गया है।”
भागीदारी और प्रबंधन के बीच अंतर: राजस्व विभाग के इस तर्क को संबोधित करते हुए कि वक्ता कार्यक्रम के लिए अभिन्न हैं, कोर्ट ने स्पष्ट किया: “हालांकि, क्या वक्ता की सेवा या वक्ता की ओर से एजेंट की सेवा को ‘इवेंट मैनेजमेंट सर्विस’ माना जा सकता है, यह बिल्कुल अलग मुद्दा है। वक्ता कार्यक्रम की योजना, प्रचार, आयोजन या प्रस्तुति नहीं करता है… कार्यक्रम में भागीदारी को कार्यक्रम का प्रबंधन नहीं माना जा सकता है। यही वह मौलिक त्रुटि है जो राजस्व विभाग के साथ-साथ ट्रिब्यूनल ने भी की है…”
कर कानूनों की सख्त व्याख्या: शिव स्टील्स बनाम असम राज्य (2025) के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कर कानूनों (taxing statutes) की सख्त व्याख्या के सिद्धांत को दोहराया। कोर्ट ने कहा कि यदि मामला कर कानून के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता है, तो अनुमान या सादृश्य (inference or analogy) द्वारा कोई टैक्स नहीं लगाया जा सकता है।
कॉमन पार्लेंस टेस्ट (सामान्य बोलचाल परीक्षण): कोर्ट ने “सामान्य बोलचाल परीक्षण” भी लागू किया और नोट किया कि सामान्य समझ में, “इवेंट मैनेजमेंट” का अर्थ पूरे कार्यक्रम का प्रबंधन या आयोजन करने के लिए किसी को नियुक्त करना है। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला: “कार्यक्रम में भागीदारी के लिए आवश्यक व्यक्तियों की बुकिंग के लिए व्यक्तिगत अनुबंध को सामान्य रूप से ‘इवेंट मैनेजमेंट’ अनुबंध नहीं समझा जाता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार कर लिया और ट्रिब्यूनल के विवादित फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बुकिंग एजेंटों के माध्यम से वक्ताओं को दी गई फीस “इवेंट मैनेजमेंट सर्विस” की श्रेणी के तहत सर्विस टैक्स के दायरे में नहीं आती है।
केस डीटेल्स:
केस टाइटल: एचटी मीडिया लिमिटेड बनाम प्रिंसिपल कमिश्नर दिल्ली साउथ गुड्स एंड सर्विस टैक्स
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 23525-23526 / 2017
कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन

