सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वे भारत राष्ट्र समिति (BRS) के उन विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर अब तक उठाए गए कदमों की स्थिति रिपोर्ट दो हफ्ते के भीतर दाखिल करें, जिन्होंने कांग्रेस में दल-बदल किया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह आखिरी मौका दिया जा रहा है, और अगली सुनवाई तक यदि स्थिति रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई तो “परिणाम भुगतने होंगे”।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने अध्यक्ष की ओर से पेश होते हुए बताया कि कुल आठ मामलों में से सात में आदेश सुना दिया गया है और एक मामले में आदेश सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अध्यक्ष को हाल ही में आंख की सर्जरी करानी पड़ी थी, जिससे कार्यवाही पूरी करने में देरी हुई है। इस आधार पर आठ सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा गया।
वहीं, बीआरएस विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने इसका विरोध किया और कहा कि अदालत की पिछली समयसीमा पहले ही खत्म हो चुकी है और अध्यक्ष बार-बार समय नहीं मांग सकते। “तीन महीने की समयावधि पहले ही दी जा चुकी थी, जो अब समाप्त हो चुकी है।” उन्होंने कहा।
यह विवाद उन 10 बीआरएस विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने से जुड़ा है, जिनके खिलाफ अयोग्यता की याचिकाएं दायर की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई 2025 को तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया था कि वे तीन महीने के भीतर इन याचिकाओं पर निर्णय लें।
लेकिन जब तय समय में फैसला नहीं हुआ, तो शीर्ष अदालत ने 17 नवंबर 2025 को अध्यक्ष को अवमानना नोटिस जारी किया और इसे “घोरतम अवमानना” बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करते वक्त विधानसभा अध्यक्ष न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते हैं, न कि एक संवैधानिक अधिकारी के रूप में जिन्हें पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त हो।
यह अवमानना याचिका बीआरएस नेताओं के.टी. रामाराव, पाडी कौशिक रेड्डी और के.ओ. विवेकानंद की ओर से दाखिल रिट याचिकाओं से उत्पन्न हुई है।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अब अगली सुनवाई की तारीख तक एक विस्तृत स्थिति रिपोर्ट दाखिल की जाए जिसमें यह बताया जाए कि अयोग्यता मामलों के निपटान के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।

