केरल हाईकोर्ट की फुल बेंच का बड़ा फैसला: हिंदू पत्नी को पति की अचल संपत्ति से भरण-पोषण पाने का अधिकार

केरल हाईकोर्ट की फुल बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि एक हिंदू पत्नी अपने पति की अचल संपत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार ‘हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956’ के विशिष्ट प्रावधानों से स्वतंत्र है। हाईकोर्ट ने 2007 के विजयन बनाम शोभना मामले में दिए गए डिवीजन बेंच के फैसले को पलटते हुए कहा कि सामान्य वैवाहिक जीवन के दौरान यह अधिकार “निष्क्रिय” (Dormant) रहता है, लेकिन कानूनी कार्यवाही शुरू होते ही यह संपत्ति पर बाध्यकारी हो जाता है।

जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी, जस्टिस पी.वी. कुन्हिकृष्णन और जस्टिस जी. गिरीश की बेंच ने यह निर्णय एक डिवीजन बेंच द्वारा भेजे गए रेफरेन्स (Reference) पर दिया। मामला इस कानूनी सवाल पर केंद्रित था कि क्या ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882’ की धारा 39 हिंदू पत्नियों के भरण-पोषण के दावों पर लागू होती है या नहीं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद एक अपील (Mat. Appeal No. 1093 of 2014) से उत्पन्न हुआ। एक व्यक्ति (क्लेम पिटीशनर) ने 16 जुलाई 2007 को एक पति से 5 सेंट जमीन खरीदी थी, जिसके अपनी पत्नी के साथ संबंध तनावपूर्ण थे। इसके बाद, पत्नी ने भरण-पोषण के लिए याचिका दायर की और 14 नवंबर 2007 को उक्त संपत्ति को कुर्क (Attach) करवा लिया। पत्नी को 12 मार्च 2009 को कोर्ट से अपने पक्ष में डिक्री मिल गई।

जब फैमिली कोर्ट ने रमनकुट्टी पुरुषोत्तमन बनाम अम्मिनिकुट्टी के फैसले का हवाला देते हुए खरीददार की याचिका खारिज कर दी, तो उसने डिवीजन बेंच में अपील की। खरीददार का तर्क था कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत पत्नी को पति की अचल संपत्ति के मुनाफे से भरण-पोषण पाने का कोई विशिष्ट अधिकार नहीं है। उसने विजयन बनाम शोभना (2007) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसे मामलों में ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 39 लागू नहीं होती।

विजयन मामले के फैसले और सथियम्मा बनाम गायत्री (2013)हादिया (नाबालिग) बनाम शमीरा (2025) जैसे अन्य फैसलों में विरोधाभास को देखते हुए, डिवीजन बेंच ने मामले को फुल बेंच के पास भेज दिया था।

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दलीलें और कानूनी पक्ष

याचिकाकर्ता (खरीददार) की मुख्य दलील यह थी कि 1956 का अधिनियम स्पष्ट रूप से पत्नी को संपत्ति के मुनाफे से भरण-पोषण का अधिकार नहीं देता, इसलिए ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 39 लागू नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट की सहायता के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता टी. कृष्णनउन्नी ने कानूनी इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्राचीन हिंदू शास्त्रों और विभिन्न हाईकोर्ट्स के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पति की जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि यह उसकी संपत्ति तक विस्तृत है। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत दायित्व पत्नी को पति की संपत्ति से भरण-पोषण पाने के अधिकार से वंचित नहीं करता।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

फुल बेंच ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 39 और 1956 के अधिनियम की धारा 4, 18, 21, 27 और 28 का गहन विश्लेषण किया।

कोर्ट ने कहा कि 1956 के अधिनियम में जीवित पति की संपत्ति पर पत्नी के दावे के बारे में स्पष्ट प्रावधान न होना (जबकि विधवा के लिए प्रावधान है) एक “चूक” (Omission) है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“यह न्याय का उपहास (Travesty of justice) होगा यदि अपने पति द्वारा त्यागी गई एक बेसहारा हिंदू महिला के पास अपने पति की संपत्तियों के खिलाफ कार्यवाही करने का विकल्प न हो और भरण-पोषण से इनकार किए जाने पर उसे गरीबी में रहना पड़े।”

‘निष्क्रिय’ और ‘अपूर्ण’ अधिकार की अवधारणा

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अधिकार संपत्ति हस्तांतरण को कब प्रभावित करता है:

  1. निष्क्रिय अवस्था (Dormant Stage): विवाह के साथ ही भरण-पोषण का अधिकार उत्पन्न होता है, लेकिन जब तक पति भरण-पोषण कर रहा है, यह “निष्क्रिय” रहता है। इस चरण में, खरीददार से इस अधिकार की जानकारी होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
  2. अपूर्ण अधिकार (Inchoate Right): जब पत्नी कानूनी प्रक्रिया शुरू करती है (जिसमें पंजीकृत कानूनी नोटिस भेजना भी शामिल है) या पति की मृत्यु हो जाती है, तो यह अधिकार सक्रिय हो जाता है।
  3. क्रिस्टलीकृत प्रभार (Crystallized Charge): सक्षम न्यायालय द्वारा डिक्री पारित करने पर यह अधिकार संपत्ति पर एक पक्के ‘चार्ज’ (Charge) में बदल जाता है।

बेंच ने स्पष्ट किया कि हर खरीददार से यह अपेक्षा करना कि उसे विक्रेता की वैवाहिक स्थिति का पता हो, संपत्ति के लेन-देन को “बेहद जोखिम भरा” बना देगा। हालांकि, एक बार कानूनी कदम उठाए जाने के बाद, खरीददार को नोटिस मिला हुआ माना जाएगा।

2007 का फैसला पलटा

फुल बेंच ने विजयन बनाम शोभना के तर्क से असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि 1956 के एक्ट की धारा 28 और टी.पी. एक्ट की धारा 39 जीवित पति के खिलाफ पत्नी के दावे पर लागू नहीं होती। कोर्ट ने कहा:

“1956 के अधिनियम की धारा 18 के तहत एक हिंदू पत्नी का भरण-पोषण का हक केवल पति के व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पति की संपदा (Estate) तक भी विस्तृत है। इसलिए, इसके विपरीत विजयन बनाम शोभना में व्यक्त किया गया विचार सही कानून नहीं माना जा सकता।”

निर्णय

फुल बेंच ने रेफरेन्स का उत्तर देते हुए निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:

  1. अधिकार: एक हिंदू पत्नी, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के प्रावधानों से इतर भी अपने पति की अचल संपत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है।
  2. निष्क्रिय चरण: यह अधिकार तब तक “निष्क्रिय चरण” में माना जाएगा जब तक वह कानूनी कदम नहीं उठाती या विधवा नहीं हो जाती।
  3. खरीददार का दायित्व: निष्क्रिय चरण के दौरान, ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 39 के उद्देश्यों के लिए खरीददार को अधिकार की जानकारी होने की धारणा नहीं बनाई जाएगी, जब तक कि यह साबित न हो कि उसे भरण-पोषण से इनकार करने की जानकारी थी या हस्तांतरण मुफ्त (gratuitous) था।
  4. कानूनी कार्रवाई का प्रभाव: यदि हस्तांतरण उस अवधि के दौरान होता है जब कानूनी कार्रवाई (पंजीकृत नोटिस सहित) शुरू की जा चुकी है, तो “खरीददार को ऐसे अधिकार की जानकारी होना माना जाएगा।”
  5. फैसला पलटा गया: विजयन बनाम शोभना [ILR 2007(1) Kerala 822] में स्थापित कानून सही नहीं है, जहां तक यह मानता था कि पत्नी और बच्चों को पति की अचल संपत्ति के मुनाफे से भरण-पोषण का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है।
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रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि आदेश को आगे की प्रक्रियाओं के लिए संबंधित डिवीजन बेंच को भेजा जाए।

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