हत्या के आरोपी को 14 साल बाद केरल हाईकोर्ट से राहत, आजीवन कारावास रद्द कर कहा— नहीं मिला निष्पक्ष मुकदमा

केरल हाईकोर्ट ने हत्या के एक आरोपी को 14 साल जेल में बिताने के बाद दोषमुक्त कर दिया है, यह कहते हुए कि उसे निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार नहीं मिला। अदालत ने सेशंस कोर्ट द्वारा की गई भारी प्रक्रिया संबंधी चूकों को गंभीरता से लिया और दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति राजा विजयाराघवन और न्यायमूर्ति के वी जयकुमार की खंडपीठ ने 12 जनवरी को सुनाया गया यह निर्णय देते हुए कहा कि आरोपी को एक “टुकड़ों-टुकड़ों में चलाए गए” लंबे समय तक चले ट्रायल का सामना करना पड़ा, जिसमें कई कानूनी गड़बड़ियां थीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमे की अवधि के एक महत्वपूर्ण हिस्से में आरोपी के पास कोई सक्षम वकील नहीं था और उसे खुद ही अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करनी पड़ी। इतना ही नहीं, कई अहम गवाहों की गवाही आरोपी की अनुपस्थिति में करवाई गई, जो कि कानूनन गलत है।

अदालत ने यह भी पाया कि कई मौकों पर सत्र न्यायाधीश ने अभियोजन पक्ष के वकील की गैरमौजूदगी में स्वयं गवाहों से मुख्य परीक्षा (chief examination) ली, जिसे कोर्ट ने “गैरकानूनी और अन्यायपूर्ण” बताया।

यह मामला सितंबर 2011 में ओणम उत्सव के दौरान कोट्टायम जिले के पंपडी इलाके में दो समूहों के बीच ताश के खेल को लेकर हुई झड़प के बाद सामने आया था, जिसमें अभियोजन के अनुसार आरोपी ने एक व्यक्ति को चाकू मार दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई।

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यह मामला जुलाई 2012 में सत्र न्यायालय को सौंपा गया और अक्टूबर 2019 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और ₹50,000 का जुर्माना लगाया गया। आरोपी पूरे समय न्यायिक हिरासत में रहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि चार्ज फ्रेम होने के बाद सात वर्षों तक मामला सौ से अधिक बार स्थगित किया गया। सेशंस जज द्वारा दिए गए कारणों को कोर्ट ने “अनुचित और असंगत” करार दिया।

“ऑर्डर शीट से स्पष्ट है कि सत्र न्यायाधीश ने हिरासत में चल रहे इस ट्रायल को प्राथमिकता नहीं दी और अन्य मामलों को तरजीह दी,” अदालत ने कहा।

हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी ने करीब 14 साल हिरासत में बिताए — जांच, ट्रायल और अपील के दौरान — और इस स्थिति में दोबारा ट्रायल कराना न तो न्यायसंगत है, न ही उपयुक्त।

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कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड, संविधान के निर्देश और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि आरोपी को निष्पक्ष ट्रायल का अधिकार नहीं मिला।”

कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया और कहा कि यदि आरोपी ने कोई जुर्माना अदा किया हो, तो उसे वापस किया जाए।

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