झूठे मुकदमों और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस जांच में यह पाया जाता है कि एफआईआर (FIR) झूठी सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई थी, तो विवेचना अधिकारी (Investigating Officer) के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले (Informant) के खिलाफ झूठी गवाही और गुमराह करने का लिखित परिवाद (Complaint) दर्ज कराए।
इसके साथ ही, न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी की पीठ ने यह भी साफ किया कि असंज्ञेय अपराधों (Non-cognizable offences) में पुलिस द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को ‘स्टेट केस’ (State Case) नहीं, बल्कि ‘परिवाद’ (Complaint) माना जाना चाहिए। कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक असंज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह संज्ञान लिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। विपक्षी संख्या-2 (पति) ने अपनी पत्नी (याची) के खिलाफ थाना क्वार्सी, जिला अलीगढ़ में धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) और 507 (अज्ञात संचार द्वारा आपराधिक धमकी) आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी, जो कोरिया में किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है, फेसबुक के जरिए उसे और उसकी बेटी को बदनाम कर रही है और भारत लौटने पर जान से मारने की धमकी दी है।
पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपों को झूठा पाते हुए 19 जून 2024 को ‘अंतिम रिपोर्ट’ (Closure Report) लगा दी। इसके बाद पति ने ‘प्रोटेस्ट पिटीशन’ दाखिल की। 23 अक्टूबर 2024 को अलीगढ़ के सीजेएम ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए अंतिम रिपोर्ट को खारिज कर दिया और धारा 190(1)(b) सीआरपीसी (Cr.P.C.) के तहत मामले का संज्ञान लेते हुए इसे ‘स्टेट केस’ के रूप में चलाने का आदेश दिया।
दलीलें
याची (पत्नी) के वकील मनोज कुमार पांडे ने तर्क दिया कि वैवाहिक कलह के कारण याची को दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि चूंकि पुलिस जांच में अंतिम रिपोर्ट लगाई गई थी और कथित अपराध असंज्ञेय प्रकृति के थे, इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा इसे ‘स्टेट केस’ के रूप में दर्ज करना कानूनन गलत था।
वहीं, विपक्षी पक्ष और सरकारी वकील ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों का सही मूल्यांकन किया है और आदेश में कोई अवैधता नहीं है।
कोर्ट का विश्लेषण और निर्देश
हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 504 और 507 आईपीसी दोनों ही असंज्ञेय और जमानती अपराध हैं। कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 2(d) के स्पष्टीकरण (जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS की धारा 2(1)(h) के समान है) का हवाला देते हुए कहा कि असंज्ञेय अपराध में पुलिस अधिकारी द्वारा दी गई रिपोर्ट को ‘परिवाद’ (Complaint) माना जाएगा और पुलिस अधिकारी को ‘परिवादी’ (Complainant) समझा जाएगा।
न्यायमूर्ति गिरी ने कहा:
“वर्तमान मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ ने कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया और एक असंज्ञेय अपराध को संज्ञेय अपराध की तरह माना… विद्वान मजिस्ट्रेट को इस मामले को परिवाद (Complaint Case) के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए था।”
झूठी एफआईआर पर पुलिस की जिम्मेदारी
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू झूठी एफआईआर पर पुलिस की जवाबदेही तय करना है। कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचक (IO) जांच के बाद यह पाता है कि आरोप झूठे थे और क्लोजर रिपोर्ट लगाता है, तो उसे सूचना देने वाले के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 212 और 217 (आईपीसी की धारा 177 और 182 के समतुल्य) के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 199(b) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राज सिंह (1998) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि झूठी सूचना के अपराधों में कोर्ट बिना लोक सेवक (Public Servant) की लिखित शिकायत के संज्ञान नहीं ले सकता, इसलिए पुलिस द्वारा शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने अलीगढ़ सीजेएम के 23 अक्टूबर 2024 के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट अब कानून के अनुसार और आरोपी को सुनवाई का मौका देते हुए तीन महीने के भीतर नया आदेश पारित करें।
इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP), उत्तर प्रदेश और न्यायिक अधिकारियों को 60 दिनों के भीतर निम्नलिखित निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया:
- झूठी सूचना पर कार्रवाई अनिवार्य: जब भी पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट (Final Report) लगाती है कि आरोप झूठे या भ्रामक थे, तो पुलिस को अनिवार्य रूप से सूचना देने वाले और गवाहों के खिलाफ धारा 215(1) BNSS के तहत लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी।
- मजिस्ट्रेट की भूमिका: मजिस्ट्रेट ऐसी अंतिम रिपोर्ट को तब तक स्वीकार न करें जब तक उसके साथ झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ लिखित शिकायत न हो। यदि प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की जाती है, तो पुलिस की शिकायत पर कार्यवाही तब तक रुकी रहेगी जब तक प्रोटेस्ट पिटीशन पर निर्णय नहीं हो जाता।
- अवमानना की चेतावनी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का पालन न करना अदालत की अवमानना (Contempt of Court) माना जाएगा।
केस का विवरण
- केस का नाम: उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: आवेदन धारा 528 बीएनएसएस संख्या 12575 वर्ष 2025 (NA528 No. 12575 of 2025)
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी

