दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भारतीय वन सेवा (प्रोबेशन) संशोधन नियम, 2023 की वैधता को बरकरार रखा है। इस नियम के तहत आईएफएस (IFS) प्रोबेशनर्स को अपनी ट्रेनिंग अवधि के दौरान सिविल सेवा परीक्षा (CSE) या किसी अन्य खुली प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया है। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की खंडपीठ ने प्रोबेशनर्स की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें नियमों को पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective effect) से लागू करने को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा शर्तें और प्रोबेशन के नियम स्थिर नहीं होते और ये ट्रेनिंग की अवधि पर भविष्यलक्षी प्रभाव (Prospectively) से लागू होते हैं।
यह मामला केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), प्रधान पीठ, नई दिल्ली के 12 दिसंबर, 2025 के आदेश से जुड़ा है। कैट ने आईएफएस प्रोबेशनर्स की याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं ने 2023 के उस संशोधन को चुनौती दी थी, जिसने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA) में ट्रेनिंग के दौरान अन्य परीक्षाओं में बैठने पर प्रतिबंध लगा दिया था। हाईकोर्ट ने माना कि यह संशोधन चल रही ट्रेनिंग के दौरान आचरण को नियंत्रित करता है और यह किसी निहित अधिकार (Vested Right) का हनन नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता भारतीय वन सेवा परीक्षा, 2022 के सफल उम्मीदवार हैं। उन्होंने 15 नवंबर, 2023 को आईजीएनएफए (IGNFA) में अपनी प्रोबेशनरी ट्रेनिंग ज्वाइन की थी। जिस समय उन्होंने ज्वाइन किया, उस समय 1968 के नियमों का नियम 8 लागू था, जिसमें 2017 में किए गए एक संशोधन के कारण परीक्षा में बैठने पर कोई रोक नहीं थी।
हालाँकि, उनके ज्वाइन करने के कुछ ही दिनों बाद, 23 नवंबर, 2023 को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने भारतीय वन सेवा (प्रोबेशन) संशोधन नियम, 2023 अधिसूचित कर दिया। इस संशोधन के जरिए नियम 8(1) में एक प्रावधान फिर से जोड़ा गया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि “सेवा में कोई भी प्रोबेशनर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून में प्रशिक्षण की अवधि के दौरान, सिविल सेवा परीक्षा या किसी अन्य केंद्रीय या राज्य सेवा की खुली प्रतियोगी परीक्षा में उपस्थित नहीं होगा।”
जब याचिकाकर्ताओं ने सीएसई (CSE) में बैठने की अनुमति मांगी या 2023 के संशोधन से छूट का अनुरोध किया, तो सक्षम प्राधिकारी ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने ट्रिब्यूनल और फिर हाईकोर्ट में अपील की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं का तर्क: याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे 15 नवंबर, 2023 को ट्रेनिंग में शामिल हो चुके थे, जबकि नया नियम 23 नवंबर, 2023 को आया, इसलिए यह उन पर लागू नहीं होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि ज्वाइनिंग के समय लागू नियमों के आधार पर उन्हें यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में बैठने की “वैध अपेक्षा” (Legitimate Expectation) थी। उन्होंने इसे पूर्वव्यापी (Retrospective) तौर पर लागू करना मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया। याचिकाकर्ताओं ने अपनी योग्यता का हवाला देते हुए कहा कि बिना किसी गलती के उन पर यह प्रतिबंध लगाना दंडात्मक है।
केंद्र सरकार (प्रतिवादी) का तर्क: सरकार की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि यह संशोधन अनुशासन सुनिश्चित करने, निर्बाध प्रशिक्षण और सरकारी संसाधनों के उचित उपयोग के लिए किया गया है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ताओं को विकल्प दिया गया था कि यदि वे सीएसई में बैठना चाहते हैं तो वे अपनी ट्रेनिंग को टाल सकते हैं (Deferment) या छूट ले सकते हैं, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से ज्वाइन करना और ट्रेनिंग जारी रखना चुना। सरकार ने सैयद याकूब बनाम के.एस. राधाकृष्णन के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र पर्यवेक्षी है और ट्रिब्यूनल के तथ्यात्मक निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं के इस आधार को खारिज कर दिया कि नियुक्ति की तारीख पर मौजूद सेवा शर्तें हमेशा के लिए स्थिर रहती हैं।
निहित अधिकार और पूर्वव्यापी प्रभाव पर: कोर्ट ने कहा कि सेवा कानून यह मान्यता देता है कि सेवा की शर्तें समय-समय पर लागू होने वाले वैधानिक नियमों द्वारा शासित होती हैं। पीठ ने टिप्पणी की:
“एक प्रोबेशनर को यह जिद करने का कोईimmutable या निहित अधिकार प्राप्त नहीं होता है कि सेवा में प्रवेश की तारीख पर प्रचलित नियामक ढांचा प्रोबेशन की पूरी अवधि या उसके बाद भी अपरिवर्तित रहना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट के हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम राज कुमार (2022) के फैसले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि जनहित में नियमों में संशोधन किया जा सकता है और वे लागू होने की तारीख से प्रभावी होंगे। कोर्ट ने कहा कि 2023 का संशोधन पूर्वव्यापी (Retrospective) नहीं है, भले ही याचिकाकर्ताओं ने अधिसूचना से कुछ दिन पहले ज्वाइन किया हो।
“संशोधन केवल उस तरीके को नियंत्रित करता है जिससे इसके लागू होने की तारीख से प्रोबेशनरी ट्रेनिंग ली जानी है। इसलिए, जो प्रोबेशनर्स अधिसूचना की तारीख पर पहले से ही ट्रेनिंग ले रहे थे, उन पर इसका लागू होना एक सतत चल रहे संबंध पर भविष्यलक्षी प्रभाव है, न कि निहित अधिकारों में पूर्वव्यापी हस्तक्षेप।”
वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) पर: कोर्ट ने ‘वैध अपेक्षा’ की दलील को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी अपेक्षा वैध रूप से बनाए गए वैधानिक नियम को विफल नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा:
“एक बार जब सक्षम प्राधिकारी ने अपनी नियम-बनाने की शक्ति का प्रयोग करते हुए 2023 के संशोधन को अधिसूचित करके पुराने निषेध को बहाल कर दिया, तो संशोधित नियम के विपरीत कोई भी प्रवर्तनीय अपेक्षा जीवित नहीं रह सकती।”
उपायों का चुनाव (Election of Remedies): कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास ट्रेनिंग को टालने का विकल्प था। ट्रेनिंग जारी रखने का विकल्प चुनने के बाद, वे चुनिंदा रूप से उन नियमों को अस्वीकार नहीं कर सकते जो उन्हें अलाभकारी लगते हैं। कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति एक ही समय में नियमों को स्वीकार और अस्वीकार (Approbate and Reprobate) नहीं कर सकता।
मनमानापन नहीं: खंडपीठ ने पाया कि यह प्रतिबंध न तो स्थायी है और न ही दंडात्मक, बल्कि यह संस्थागत अनुशासन और संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए केवल ट्रेनिंग अवधि तक सीमित है।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रिब्यूनल के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। कोर्ट ने फैसला सुनाया:
- आईएफएस प्रोबेशनर्स यह दावा नहीं कर सकते कि वे केवल नियुक्ति की तारीख पर प्रचलित नियमों से ही शासित होंगे।
- भारतीय वन सेवा (प्रोबेशन) संशोधन नियम, 2023 याचिकाकर्ताओं पर लागू होते हैं क्योंकि संशोधन ट्रेनिंग की अवधि को नियंत्रित करता है।
- सिविल सेवा परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से इनकार करना मनमाना नहीं है।
तदनुसार, रिट याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
केस डिटेल्स:
केस टाइटल: अभिमन्यु सिंह और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (तथा अन्य संबंधित मामले)
केस नंबर: W.P.(C) 171/2026 और CM APPL. 847/2026
कोरम: जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन
याचिकाकर्ताओं के वकील: श्री श्रेय कपूर, श्री निशित अग्रवाल, सुश्री कनिष्का मित्तल, सुश्री दीप्ति राठी
प्रतिवादियों के वकील: सुश्री मोनिका अरोड़ा (CGSC), श्री देबाशीष मिश्रा (GP), श्री शशांक दीक्षित (CGSC), श्री सुभ्रोदीप साहा, श्री प्रभात कुमार

