बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला किसी पुरुष के साथ यह जानते हुए संबंध बनाती है कि वह पहले से विवाहित है, तो वह घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA) के तहत किसी भी राहत की हकदार नहीं है। हाईकोर्ट ने माना कि ऐसे संबंधों को अधिनियम की धारा 2(f) के तहत “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” (relationship in the nature of marriage) के रूप में नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया और सत्र न्यायालय (Sessions Court) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने याचिकाकर्ता को दी गई मौद्रिक राहत और मुआवजे को रद्द कर दिया था। इससे पहले न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), पुणे ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, जो एक इंजीनियरिंग छात्रा थी, ने दावा किया कि अपनी डिग्री की पढ़ाई के दौरान उसकी पहचान प्रतिवादी नंबर 1 से हुई, जो उसी कॉलेज में प्रोफेसर थे। उनका आरोप था कि प्रतिवादी ने यह कहकर उनकी सहानुभूति हासिल की कि उनकी पत्नी (प्रतिवादी नंबर 2) मानसिक रूप से बीमार हैं और 2001 में उनके साथ संबंध शुरू किए।
याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह तलाक लेने के बाद उनसे शादी करेंगे। उन्होंने दावा किया कि 18 जून 2005 को उन्होंने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ महाड के एक गणपति मंदिर में गुप्त रूप से शादी कर ली। इसके बाद, वे मुंबई और पुणे में पति-पत्नी के रूप में साथ रहे। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उनके आईवीएफ (IVF) उपचार के दौरान प्रतिवादी ने पति की भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप एक बेटे का जन्म हुआ।
याचिकाकर्ता ने 2011 में PWDVA के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। JMFC, पुणे ने 31 मार्च 2015 को उनकी याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिवादी को 28,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता, 5 लाख रुपये मुआवजा और 10,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया था।
हालाँकि, इस आदेश को सत्र न्यायालय, पुणे में चुनौती दी गई। सत्र न्यायालय ने 26 जुलाई 2016 को एक सामान्य निर्णय द्वारा याचिकाकर्ता को दी गई राहत को रद्द कर दिया। इस आदेश से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील नारायण जी. रोकड़े ने तर्क दिया कि प्रतिवादी ने गलत बयानी (misrepresentation) करके उनके मुवक्किल के साथ संबंध बनाए थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि:
- दोनों पक्षों ने विवाह समारोह संपन्न किया था।
- वे सरकारी क्वार्टर और किराए के मकानों में लंबे समय तक साथ रहे।
- प्रतिवादी नंबर 1 ने उनके बैंक खाते के लिए मैंडेट होल्डर के रूप में उनके वित्त (finances) को नियंत्रित किया।
- संयुक्त रूप से खरीदे गए फ्लैट और वाहनों के सबूत मौजूद हैं।
- प्रतिवादी ने आईवीएफ उपचार के लिए सहमति पत्रों पर “पति” के रूप में हस्ताक्षर किए थे।
वकील ने तर्क दिया कि ये तथ्य “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” स्थापित करते हैं, जो उन्हें अधिनियम के तहत सुरक्षा का अधिकार देते हैं।
प्रतिवादियों की दलीलें: प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील सुजय एच. गांगल ने तर्क दिया कि यह संबंध ज्यादा से ज्यादा एक विवाहेतर संबंध (extramarital affair) था। उन्होंने कहा कि:
- याचिकाकर्ता एक उच्च शिक्षित महिला हैं और उन्होंने “खुली आँखों” से यह संबंध बनाया था, जबकि उन्हें पूरी जानकारी थी कि प्रतिवादी पहले से विवाहित हैं।
- सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी. सरमा के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि विवाहित व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप PWDVA की धारा 2(f) के दायरे में नहीं आता है।
- जबरन शारीरिक संबंध बनाने के आरोपों और कथित विवाह समारोह की वैधता पर भी सवाल उठाए गए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और तर्क
न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे ने PWDVA की धारा 2(f) के तहत “घरेलू संबंध” (Domestic Relationship) की व्याख्या पर ध्यान केंद्रित किया, विशेष रूप से यह जांचने के लिए कि क्या याचिकाकर्ता के संबंध को “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” कहा जा सकता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (2010) का संदर्भ दिया, जिसमें “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” के लिए चार आवश्यक मानदंड निर्धारित किए गए थे:
- युगल को समाज के सामने खुद को पति-पत्नी के समान प्रस्तुत करना चाहिए।
- उनकी उम्र शादी के लिए कानूनी होनी चाहिए।
- वे कानूनी शादी करने के लिए अन्यथा योग्य होने चाहिए, जिसमें अविवाहित होना शामिल है।
- उन्होंने एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए स्वेच्छा से साथ निवास किया हो।
कोर्ट ने अवलोकन किया:
“मौजूदा मामले में प्रतिवादी नंबर 1, जो पहले से ही विवाहित है, शर्त संख्या (c) को पूरा नहीं करता है, जिसके लिए आवश्यक है कि पार्टियां कानूनी विवाह में प्रवेश करने के लिए योग्य होनी चाहिए, जिसमें अविवाहित होना शामिल है।”
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी. सरमा (2013) के फैसले पर भरोसा करते हुए, हाईकोर्ट ने नोट किया कि यदि कोई महिला यह जानते हुए संबंध बनाती है कि पुरुष विवाहित है, तो उस संबंध की स्थिति “रखैल” (concubine or mistress) जैसी होती है, जो PWDVA के तहत सुरक्षा के लिए योग्य नहीं है।
न्यायमूर्ति देशपांडे ने कहा:
“यह याचिकाकर्ता द्वारा स्वीकार किया गया है कि उसे पता था कि प्रतिवादी नंबर 1 विवाहित है और उसका एक बच्चा है, फिर भी उसके गलत बयानी के कारण, उसने उसके साथ संबंध बनाए… इसलिए यह स्पष्ट है कि यह भली-भांति जानते हुए भी कि प्रतिवादी विवाहित है, याचिकाकर्ता ने एक ऐसे संबंध में प्रवेश किया, जिसकी कोई कानूनी पवित्रता (legal sanctity) नहीं है।”
कोर्ट ने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में गुजारा भत्ता देना “कानूनी रूप से विवाहित पत्नी और बच्चों के हितों के खिलाफ” होगा।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रही कि प्रतिवादी के साथ उसका संबंध अधिनियम के तहत आवश्यक “विवाह की प्रकृति वाला संबंध” था। नतीजतन, वह PWDVA के तहत राहत की हकदार नहीं है।
“याचिकाकर्ता का संबंध PWDVA, 2005 की धारा 2(f) के तहत परिभाषित घरेलू संबंधों के दायरे में नहीं आता है, और परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता उक्त अधिनियम के तहत संरक्षण की हकदार नहीं है।”
तदनुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पुणे के आदेश को बरकरार रखा गया।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: शीतल चंद्रकांत कुंजीर बनाम चंद्रकांत तुकाराम कुंजीर और अन्य
- केस नंबर: रिट याचिका संख्या 3946 वर्ष 2016
- कोरम: न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री नारायण जी. रोकड़े साथ में श्री स्वप्निल एस. कालोखे
- प्रतिवादियों के वकील: श्री सुजय एच. गांगल साथ में श्री स्वराज एम. सावंत

