इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की मदद करने वाले कथित सिंडिकेट से जुड़े मामले में डॉ. अब्दुल गफ्फार की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अपील को खारिज करते हुए जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी को गिरफ्तार करने में विफल रहने पर जांच एजेंसी के प्रति “गंभीर नाराजगी” व्यक्त की है।
अदालत राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम (NIA Act), 2008 की धारा 21(4) के तहत दायर एक आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस अपील में विशेष न्यायाधीश, एनआईए/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, लखनऊ द्वारा 19 नवंबर, 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था।
अपीलकर्ता पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-B, 419, 420, 467, 468, 471 और 370, विदेशी अधिनियम की धारा 14 और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12(1) व 12(2) के तहत आरोप हैं।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
एटीएस गोमतीनगर, लखनऊ द्वारा 11 अक्टूबर, 2023 को दर्ज की गई एफआईआर में दस आरोपियों को नामजद किया गया था, जिसमें अपीलकर्ता डॉ. अब्दुल गफ्फार का नाम नौवें नंबर पर था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, एनआईए/एटीएस को अक्टूबर 2021 में इनपुट्स मिले थे कि “समाज के तथाकथित सम्मानित व्यक्तियों” का एक सिंडिकेट भारत में रोहिंग्याओं और अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को बसाने का प्रबंधन कर रहा है। आरोप है कि आरोपियों ने एक सिंडिकेट बनाया, विभिन्न बैंक खाते खोले और “घुसपैठियों की मदद के लिए दूसरे देशों से हवाला लेनदेन” का उपयोग किया।
राज्य पक्ष ने तर्क दिया कि सर्विलांस से पता चला है कि अपीलकर्ता सह-आरोपी अब्दुल अव्वाल और अन्य लोगों के संपर्क में था जो राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल थे। 2 फरवरी, 2024 को प्राप्त एफएसएल (FSL) रिपोर्ट में कथित तौर पर इन बातचीत की पुष्टि हुई है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता का पक्ष: अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पूर्णेंदु चक्रवर्ती ने तर्क दिया कि:
- जनवरी 2024 और फरवरी 2025 के बीच सह-आरोपियों के खिलाफ सात आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं, लेकिन अपीलकर्ता के खिलाफ कोई आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है।
- जांच एजेंसी ने नई दिल्ली स्थित अपीलकर्ता के कार्यालय “सन शाइन हेल्थ एंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी” के लिए सर्च वारंट प्राप्त नहीं किया।
- धारा 82/83 सीआरपीसी के तहत जारी उद्घोषणा आदेश को हाईकोर्ट ने 11 दिसंबर, 2025 को रद्द कर दिया था, जिसका अर्थ है कि वर्तमान में कोई भी दंडात्मक कदम लंबित नहीं था।
- गुरसेवक सिंह बनाम पंजाब राज्य (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, वकील ने तर्क दिया कि दो साल से अधिक समय तक आरोपी को गिरफ्तार न करना अग्रिम जमानत का आधार है।
- अपीलकर्ता जांच में सहयोग करने के लिए तैयार है।
राज्य का पक्ष: अपर शासकीय अधिवक्ता श्री एस.एन. तिलहरी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा:
- अपीलकर्ता इस सिंडिकेट का “मुख्य सरगना (Kingpin)” है।
- रोहिंग्या व्यक्तियों से अपीलकर्ता की सोसाइटी के खाते में स्थानांतरित धन का उपयोग भारत में रोहिंग्याओं के लिए घर और झोपड़ियां बनाने में किया गया था।
- पूरक केस डायरी (SCD) नंबर 32 में ऐसी बातचीत का विवरण है जहां अपीलकर्ता ने सह-आरोपी अब्दुल अव्वाल को “सभी बातचीत डिलीट करने” का निर्देश दिया, जो उसके गलत इरादे को दर्शाता है।
- अपीलकर्ता फरार चल रहा था, जिसके कारण 13 मार्च, 2024 और 13 फरवरी, 2025 को गैर-जमानती वारंट जारी किए गए थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
जांच एजेंसी के आचरण पर: खंडपीठ ने आरोपों की गंभीरता के बावजूद अपीलकर्ता को गिरफ्तार करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाने पर जांच अधिकारी (IO) की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा:
“हम जांच एजेंसी, विशेष रूप से जांच अधिकारी (IO) के लापरवाह और उदासीन रवैये पर अपनी गंभीर नाराजगी दर्ज करते हैं, जिन्होंने ऐसे मामले में अपीलकर्ता को पकड़ने के लिए उचित कदम नहीं उठाए, जहां आरोप न केवल संज्ञेय अपराधों से संबंधित हैं, बल्कि उन अपराधों के कारण देश की सुरक्षा, शांति और सद्भाव को खतरा हो सकता है।”
कोर्ट ने रजिस्ट्री को आदेश की एक प्रति मुख्य सचिव (उ.प्र.), अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को “उचित कार्रवाई/आदेश” के लिए भेजने का निर्देश दिया।
अग्रिम जमानत पर: कोर्ट ने वर्तमान मामले को अपीलकर्ता द्वारा उद्धृत गुरसेवक सिंह मामले से अलग माना। जजों ने कहा कि उस मामले के विपरीत, यहां आरोप “देश की सुरक्षा, अखंडता और शांति” से संबंधित हैं।
पी. कृष्ण मोहन रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2025) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर भरोसा जताते हुए, हाईकोर्ट ने जोर दिया कि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत जांच को नुकसान पहुंचा सकती है। पीठ ने कहा:
“प्रथम दृष्टया, अपराध संज्ञेय प्रकृति के हैं… सात आरोप पत्र दाखिल करके जांच एजेंसी द्वारा एकत्र की गई सामग्री के आधार पर, अपीलकर्ता से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की संभावना हो सकती है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील को खारिज कर दिया और विशेष न्यायाधीश द्वारा अग्रिम जमानत नामंजूर किए जाने के आदेश को बरकरार रखा।
हालाँकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता को जांच में सहयोग करने के लिए एक सप्ताह के भीतर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने की छूट दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“यह पूरी तरह से जांच एजेंसी/अधिकारी पर निर्भर है कि यदि अपीलकर्ता की हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता है, तो उसे हिरासत में लिया जाए, क्योंकि आरोपी को हिरासत में लेने का निर्णय जांच एजेंसी/अधिकारी की पूर्ण व्यक्तिपरक संतुष्टि (Subjective Satisfaction) पर होना चाहिए।”
यदि अपीलकर्ता को न्यायिक हिरासत में लिया जाता है, तो कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसकी नियमित जमानत याचिका पर “कानून के अनुसार सख्ती से” और शीघ्रता से निर्णय लिया जाए।
केस विवरण
- केस टाइटल: डॉ. अब्दुल गफ्फार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 4153 ऑफ 2025
- कोरम: जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव
- अपीलकर्ता के वकील: श्री पूर्णेंदु चक्रवर्ती (वरिष्ठ अधिवक्ता), साथ में श्री अजीजुल्लाह खान, मोहम्मद अलीशाह फारूकी, ओबैदुल्लाह, प्रांजल जैन और सुश्री ऐश्वर्या सक्सेना
- प्रतिवादी के वकील: श्री एस.एन. तिलहरी (एजीए)

