सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पोलावरम बहुउद्देश्यीय सिंचाई परियोजना को लेकर तेलंगाना सरकार द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन राज्य सरकार को संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत नई वाद दायर करने की स्वतंत्रता दी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि याचिका अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई थी, जो मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों के लिए है, जबकि यह मामला केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों से जुड़ा एक संवैधानिक विवाद है। इसलिए याचिका विचारणीय नहीं थी।
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि यह याचिका महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे अन्य जरूरी पक्षकारों को शामिल किए बिना दायर की गई है, जबकि वे इस परियोजना से संबंधित प्रक्रिया में हिस्सेदार रहे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तेलंगाना सरकार की ओर से पेश होकर कहा कि अनुच्छेद 131 के तहत वाद तैयार है और जल्द दाखिल किया जाएगा। उन्होंने दलील दी कि केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश को पोलावरम परियोजना के विस्तार के लिए वित्तीय सहायता दी, जो कि पर्यावरण मंजूरी और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की सिफारिशों के उल्लंघन में है।
तेलंगाना का आरोप है कि संशोधित परियोजना रिपोर्ट (DPR) में तय सीमा से अधिक पानी का डायवर्जन प्रस्तावित है और इसके लिए वैधानिक मंजूरी नहीं ली गई है।
शीर्ष अदालत ने पहले सुझाव दिया था कि इस बहु-राज्यीय विवाद को सुलझाने के लिए “मध्यस्थता” का विकल्प भी आजमाया जा सकता है। 5 जनवरी को अदालत ने यह भी संकेत दिया था कि अनुच्छेद 131 के तहत मूल वाद दाखिल करना ही बेहतर कानूनी रास्ता होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आंध्र प्रदेश की ओर से पेश होकर कहा कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट सभी राज्यों की सहमति के बाद ही स्वीकृत हुई थी। उन्होंने कहा कि केंद्रीय जल आयोग और संबंधित अवॉर्ड के अनुसार 80,000 टीएमसी तक पानी का डायवर्जन कृष्णा नदी की ओर अनुमत है।
हालांकि तेलंगाना का आरोप है कि परियोजना विस्तार में 200 टीएमसी पानी डायवर्ट करने का प्रस्ताव है, जो किसी वैधानिक स्वीकृति के बिना किया गया है।
सुनवाई के बाद तेलंगाना के सिंचाई मंत्री उत्तम कुमार रेड्डी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को धैर्यपूर्वक सुना और उचित कानूनी रास्ते पर चलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि राज्य परियोजना के इस रूप में विस्तार का विरोध जारी रखेगा।
अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है कि वह केंद्र और राज्यों या दो या अधिक राज्यों के बीच ऐसे विवादों की सुनवाई कर सके जो उनके कानूनी अधिकारों से जुड़े हों। यह अनुच्छेद सुनिश्चित करता है कि ऐसे संघीय विवादों का निपटारा सर्वोच्च न्यायिक मंच द्वारा हो।

