सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि ‘विनिर्दिष्ट पालन’ (Specific Performance) के मुकदमे से उत्पन्न अपील केवल इस आधार पर समाप्त (Abate) नहीं होती कि मृतक विक्रेता के किसी एक कानूनी वारिस के प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है, बशर्ते कि मृतक की संपत्ति का प्रतिनिधित्व अन्य जीवित वारिसों और मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले खरीददारों द्वारा पर्याप्त रूप से किया जा रहा हो।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक प्रथम अपील को ‘उपशमन’ (Abatement) के आधार पर खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मृतक पक्षकार पूरी तरह से प्रतिनिधित्वहीन नहीं होता है, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य पक्षों द्वारा उसका पर्याप्त प्रतिनिधित्व किया जाता है, तो अपील खारिज नहीं की जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 1992 में प्रतिवादी गोपाल द्वारा किशोरीलाल (अब मृतक) के खिलाफ दायर एक मुकदमे से संबंधित है, जिसमें संपत्ति खरीद के समझौते के विनिर्दिष्ट पालन की मांग की गई थी। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, किशोरीलाल ने 20 अप्रैल 1992 को एक बिक्री विलेख (Sale Deed) के माध्यम से संपत्ति अपीलकर्ताओं (ब्रजमोहन और मनोज) को बेच दी थी। निचली अदालत ने 18 अक्टूबर 2000 को वादी के पक्ष में फैसला सुनाया था।
इस डिक्री के खिलाफ, किशोरीलाल और बाद के खरीददारों (ब्रजमोहन और मनोज) ने संयुक्त रूप से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में प्रथम अपील (F.A. No. 213 of 2000) दायर की। अपील के लंबित रहने के दौरान, 17 दिसंबर 2005 को किशोरीलाल का निधन हो गया और उनके चार कानूनी प्रतिनिधियों—सुरेश, मुरारीलाल, प्रकाश और सीताबाई—को प्रतिस्थापित किया गया।
इसके बाद, 22 जुलाई 2007 को एक कानूनी वारिस मुरारीलाल का भी निधन हो गया। मुरारीलाल के वारिसों को समय पर रिकॉर्ड पर नहीं लाया जा सका। बाद में वादी-प्रतिवादी ने मुरारीलाल के वारिसों के प्रतिस्थापन न होने के कारण अपील को समाप्त (Abated) घोषित करने की मांग की। 2013 में एक आदेश में यह मानने के बावजूद कि अपील समाप्त नहीं हुई है, हाईकोर्ट ने 12 सितंबर 2017 के अपने अंतिम आदेश में अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मुरारीलाल की मृत्यु के बाद अपील का उपशमन हो गया है। इसके परिणामस्वरूप, खरीददारों द्वारा दायर एक अन्य संबंधित अपील भी खारिज हो गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि विवादित संपत्ति में किशोरीलाल का हित पहले ही ब्रजमोहन और मनोज को हस्तांतरित किया जा चुका था, जो अपीलकर्ता के रूप में रिकॉर्ड पर मौजूद थे। उन्होंने कहा कि किशोरीलाल की मृत्यु पर उनके चार वारिसों को जोड़ा गया था, और मुरारीलाल की मृत्यु के बाद भी, शेष तीन जीवित वारिस और संपत्ति के खरीददार मृतक की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करने के लिए पर्याप्त थे। यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट का 4 मार्च 2013 का पिछला आदेश, जिसमें कहा गया था कि अपील समाप्त नहीं होगी, ‘पूर्व न्याय’ (Res Judicata) के सिद्धांत के तहत बाध्यकारी था।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि विनिर्दिष्ट पालन के मुकदमे में विक्रेता एक आवश्यक पक्ष होता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के द्वारका प्रसाद सिंह बनाम हरिकांत प्रसाद सिंह (1973) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि डिक्री अविभाज्य है और यदि विक्रेता के सभी कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया जाता है, तो पूरी अपील समाप्त हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से दो मुद्दों पर विचार किया: क्या मुरारीलाल के वारिसों के प्रतिस्थापन न होने से अपील समाप्त हो गई, और क्या हाईकोर्ट का बाद का निर्णय ‘रेस ज्युडिकाटा’ द्वारा बाधित था।
1. विक्रेता एक आवश्यक पक्ष है, लेकिन संपत्ति का प्रतिनिधित्व मुख्य है अदालत ने माना कि विनिर्दिष्ट पालन के मुकदमे में विक्रेता एक आवश्यक पक्ष होता है, भले ही उसने संपत्ति किसी तीसरे पक्ष को बेच दी हो। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले को द्वारका प्रसाद सिंह के मामले से अलग बताया क्योंकि यहां मृतक विक्रेता “पूरी तरह से प्रतिनिधित्वहीन” नहीं था।
अदालत ने टिप्पणी की:
“मौजूदा मामले में, किशोरीलाल की मृत्यु पर उनके सभी कानूनी प्रतिनिधियों को प्रतिस्थापित किया गया था… हालांकि बाद में उनमें से एक, मुरारीलाल की मृत्यु हो गई। चूंकि किशोरीलाल के तीन अन्य कानूनी वारिस पहले से ही रिकॉर्ड पर थे और उनके साथ संपत्ति के खरीददार (अपीलकर्ता संख्या 2 और 3) भी मौजूद थे, इसलिए किशोरीलाल की संपत्ति का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो रहा था। हमारी राय में, मुरारीलाल के प्रतिनिधियों के प्रतिस्थापन न होने पर अपील समाप्त (Abate) नहीं हुई।”
पीठ ने महाबीर प्रसाद बनाम जागे राम (1971) और भूरे खान बनाम यासीन खान (1995) के सिद्धांतों पर भरोसा जताते हुए कहा कि यदि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य पक्ष मृतक के हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व करते हैं, तो कार्यवाही समाप्त नहीं होती है।
2. पूर्व न्याय (Res Judicata) का सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि रेस ज्युडिकाटा का सिद्धांत एक ही मुकदमे के विभिन्न चरणों के बीच भी लागू होता है। हाईकोर्ट ने अपने 3 मई 2013 के आदेश में मुरारीलाल के वारिसों को ‘प्रोफॉर्मा प्रतिवादी’ के रूप में जोड़ने की अनुमति दी थी और माना था कि अपील समाप्त नहीं हुई है।
शीर्ष अदालत ने कहा:
“एक बार जब हाईकोर्ट ने 03.05.2013 के आदेश के माध्यम से यह दृष्टिकोण अपना लिया था कि अपील समाप्त नहीं हुई है… तो बाद में हाईकोर्ट के लिए इस मुद्दे पर फिर से विचार करना खुला नहीं था, क्योंकि हाईकोर्ट की ऐसी कवायद रेस ज्युडिकाटा के सिद्धांत से बाधित थी।”
3. टंकण त्रुटि (Typographical Error) अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का 9 मई 2011 का आदेश, जिसमें मुरारीलाल के बजाय “अपीलकर्ता नंबर 1” (किशोरीलाल) को हटाने का निर्देश दिया गया था, एक “विशुद्ध लिपिकीय/टंकण त्रुटि” थी, क्योंकि किशोरीलाल की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी और उन्हें प्रतिस्थापित किया जा चुका था। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी ऐसी गलती का लाभ नहीं उठा सकते।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट का यह विचार गलत था कि अपील समाप्त हो गई है। न्यायालय ने कहा कि मुरारीलाल के वारिसों के समय पर प्रतिस्थापन न होने से अपील समाप्त नहीं हुई और हाईकोर्ट को यह अधिकार था कि वह बिना देरी को माफ किए या ‘एबेटमेंट’ को रद्द किए, उनके वारिसों को जोड़ने की अनुमति दे।
नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलों (F.A. No. 213 of 2000 और F.A. No. 217 of 2000) को बहाल कर दिया और हाईकोर्ट को कानून के अनुसार इनका फैसला करने का निर्देश दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: किशोरीलाल (मृतक) जरिए एल.आर. व अन्य बनाम गोपाल व अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 172/2026 (@SLP (C) No. 36787 of 2017) विथ सिविल अपील संख्या 173/2026
- कोरम: न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां

