कर्नाटक हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायत में लगाए गए आरोप—जैसे खाना पकाने, सफाई करने या खान-पान और पहनावे को लेकर असहमति—कानूनी तौर पर ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आते। कोर्ट ने इस कार्यवाही को “धारा 498A का क्लासिक दुरुपयोग” करार दिया और टिप्पणी की कि आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल रिश्तेदारों को फंसाने के लिए “कानूनी जाल” (criminal dragnet) के रूप में नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि ऐसे “कमजोर” आरोपों पर जांच जारी रखने की अनुमति देना कानून को “उपचार के बजाय हथियार” बनने देने जैसा होगा।
हाईकोर्ट पति, उसके माता-पिता और भाई द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने बसवनगुड़ी महिला पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। उन पर आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता), 504 (जानबूझकर अपमान) और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगाए गए थे। कोर्ट ने पाया कि घरेलू कामकाज और जीवनशैली के मतभेदों से जुड़े आरोप कानून के तहत परिभाषित क्रूरता के दायरे में नहीं आते। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने 37वें अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट, बेंगलुरु के समक्ष लंबित कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रथम याचिकाकर्ता (पति) और दूसरे प्रतिवादी (शिकायतकर्ता पत्नी) का विवाह 25 अगस्त 2017 को हुआ था। शादी के बाद जोड़ा अमेरिका (USA) चला गया, जहां पति नौकरी करता था। वे लगभग छह साल तक वहां रहे और इस दौरान उनके दो बच्चे हुए।
जनवरी 2023 में शिकायतकर्ता भारत लौट आईं। इसके बाद, 2024 में उन्होंने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने अपराध संख्या 90/2024 दर्ज किया। शिकायत में पति द्वारा घर का काम करने के लिए दबाव डालने, खाना पकाने को लेकर आलोचना करने, आहार और पहनावे पर रोक लगाने और बच्चों के प्रति उदासीनता जैसे आरोप लगाए गए थे। यह भी नोट किया गया कि पति के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी किया गया था, जिससे उनकी यात्रा बाधित हो रही थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं का पक्ष: याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि दंपत्ति अमेरिका में रहता था और जो आरोप लगाए गए हैं वे “शादी में होने वाली मामूली समस्याएं” हैं। यह भी कहा गया कि पत्नी जनवरी 2023 में भारत लौटी थीं और 2024 में दर्ज शिकायत में फोन पर उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। वकील ने दलील दी कि कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और पति के खिलाफ जारी LOC ने अन्यायपूर्ण तरीके से उनकी आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया है।
प्रतिवादियों का पक्ष: शिकायतकर्ता और राज्य लोक अभियोजक (SPP) के वकील ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि शिकायत में पति और उसके परिवार द्वारा किए गए उत्पीड़न का स्पष्ट विवरण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जांच जारी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए, विशेष रूप से पति के खिलाफ, क्योंकि आरोप अपराध के तत्वों को पूरा करते हैं।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने शिकायत का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि शिकायतें मुख्य रूप से “आहार संबंधी प्रतिबंधों, पहनावे की अपेक्षाओं, घरेलू जिम्मेदारियों के आवंटन और टीवी देखने की पसंद” जैसे मुद्दों पर थीं। साथ ही यह आरोप भी था कि पति ने पत्नी के साथ नौकर जैसा व्यवहार किया।
आरोपों की प्रकृति पर: जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा:
“भले ही इन आरोपों को सच मान लिया जाए, ये वैवाहिक कलह की तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन आईपीसी की धारा 498A के तहत परिकल्पित वैधानिक क्रूरता को दर्शाने में पूरी तरह विफल हैं। कानून असंगति (incompatibility) को अपराध नहीं मानता, न ही यह अपूर्ण विवाह को दंडित करता है। आईपीसी की धारा 498A सभी वैवाहिक समस्याओं का रामबाण इलाज नहीं है।”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धारा 498A एक लक्षित प्रावधान है जिसका उद्देश्य “गंभीर क्रूरता” या दहेज की अवैध मांगों से जुड़े उत्पीड़न को संबोधित करना है। पीठ ने पाया कि वर्तमान शिकायत में ऐसे विवरणों का पूर्ण अभाव था।
ससुराल वालों को फंसाने पर: कोर्ट ने पति के उन परिवार के सदस्यों को फंसाने पर चिंता व्यक्त की जो भारत में रह रहे थे, जबकि दंपत्ति विदेश में था। फैसले में कहा गया:
“जो बात और भी चिंताजनक है, वह है सास-ससुर और देवर को बिना किसी भेदभाव के आरोपी बनाना, जबकि वे भारत में रह रहे थे और वैवाहिक जीवन मुख्य रूप से विदेश में व्यतीत हुआ… अस्पष्ट और व्यापक आरोपों पर आधारित इस तरह के अभियोजन न्याय को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि वे वास्तव में इसे नष्ट करते हैं।”
फैसला
हाईकोर्ट ने आपराधिक याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि जांच जारी रखने का “उत्पीड़न को लंबा खींचने, याचिकाकर्ताओं को कलंकित करने और आपराधिक न्यायालयों का कीमती समय बर्बाद करने के अलावा कोई उद्देश्य नहीं होगा।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“इतने कमजोर आरोपों पर प्रथम याचिकाकर्ता के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी करना अन्याय को और बढ़ाएगा। इसलिए, आपराधिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने देना कानून को उपचार के बजाय हथियार बनने की अनुमति देने जैसा होगा।”
तदनुसार, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर और बेंगलुरु कोर्ट में लंबित कार्यवाही को रद्द कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: अबुज़ार अहमद व अन्य बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 7053 ऑफ 2024
कोरम: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना निर्णय की तिथि: 08.01.2026

