दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को आईआरसीटीसी से जुड़े कथित घोटाले में आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की उस याचिका पर केंद्रीय जांच ब्यूरो से जवाब तलब किया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आरोप तय किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। हालांकि, अदालत ने इस चरण पर ट्रायल पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि सीबीआई का पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती।
यह मामला न्यायमूर्ति स्वरना कांता शर्मा के समक्ष आया। अदालत ने याचिका और स्थगन आवेदन पर नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई की तारीख 14 जनवरी तय की है।
लालू प्रसाद यादव ने 13 अक्टूबर 2025 के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने उनके, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, पुत्र तेजस्वी प्रसाद यादव और 11 अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। यह आरोप भारतीय दंड संहिता के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश, साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं से जुड़े हैं।
ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में मामले से जुड़े भूमि और शेयर लेन-देन पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रथम दृष्टया यह रेलवे के रांची और पुरी स्थित होटलों में निजी भागीदारी के नाम पर पनपे “क्रोनी कैपिटलिज़्म” का उदाहरण हो सकता है।
अदालत ने लालू यादव के अलावा प्रदीप कुमार गोयल, राकेश सक्सेना, भूपेंद्र कुमार अग्रवाल, राकेश कुमार गोगिया और विनोद कुमार अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(d)(ii) और (iii) के तहत आरोप तय किए थे। ये प्रावधान लोक सेवक द्वारा पद के दुरुपयोग और अवैध लाभ प्राप्त करने से संबंधित हैं।
इसके साथ ही, अदालत ने आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के आरोप लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, एम/एस लारा प्रोजेक्ट्स एलएलपी, विजय कोचर, विनय कोचर, सरला गुप्ता और प्रेम चंद गुप्ता के खिलाफ तय करने का निर्देश दिया था। सभी 14 आरोपियों पर आईपीसी की धारा 120बी के तहत आपराधिक साजिश का साझा आरोप भी लगाया गया है, जिसे धोखाधड़ी और पीसी एक्ट की धाराओं के साथ जोड़ा गया है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि की स्थिति में अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, जबकि धोखाधड़ी के अपराध में अधिकतम सात वर्ष की सजा हो सकती है।

