अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से जमानत देने से कतरा रहे हैं निचली अदालतों के जज; सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में बर्खास्त जज को बहाल किया

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ तुच्छ और बेबुनियाद आरोप लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने निचली अदालतों में डर का माहौल पैदा कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इसी डर के कारण ट्रायल कोर्ट के जज जमानत देने से कतराते हैं, जिसका सीधा असर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर पड़ता है, जहां जमानत याचिकाओं का अंबार लग जाता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी, निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए की। सुलिया को 27 साल की सेवा के बाद 2015 में सेवा से हटा दिया गया था।

‘ईमानदार जजों की सुरक्षा जरूरी’

शीर्ष अदालत ने भारतीय न्याय प्रणाली में एक गंभीर प्रणालीगत मुद्दे को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि अक्सर ईमानदार अधिकारियों को असंतुष्ट वादियों के गुस्से का शिकार होना पड़ता है, जो अपने पक्ष में आदेश न आने पर जजों के खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज करा देते हैं।

कोर्ट ने कहा, “यही कारण है कि निचली न्यायपालिका के अधिकारी जमानत देने में संकोच करते हैं और हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट जमानत याचिकाओं के बोझ तले दब जाते हैं।”

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार में लिप्त “काली भेड़ों” (भ्रष्ट अधिकारियों) को बाहर करने के लिए सख्त आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन केवल फैसलों में गलती होने पर अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने से पहले हाईकोर्ट को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

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27 साल का ‘बेदाग’ करियर

यह मामला न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया से जुड़ा था, जिन्हें आबकारी अधिनियम के तहत जमानत देने में अलग-अलग मानदंड अपनाने और भ्रष्ट आचरण के आरोपों के आधार पर बर्खास्त कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अधिकारी को बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए बर्खास्त किया गया था। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इन आरोपों के सामने आने से पहले सुलिया ने न्यायपालिका की 27 वर्षों तक सेवा की थी और उनका करियर रिकॉर्ड “बेदाग” था।

फैसला लिखते हुए जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा कि केवल निर्णय में त्रुटि या गलत आदेश देने के कारण किसी न्यायिक अधिकारी को अनुशासनात्मक कार्यवाही की अग्निपरीक्षा से नहीं गुजरना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल इसलिए कि कोई आदेश गलत है या निर्णय में कोई त्रुटि है, न्यायिक अधिकारियों को ऐसी कार्यवाही के दौर से न गुजरना पड़े।”

‘साहसिक फैसला’

फैसले से सहमति जताते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला ने जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले को “बहुत साहसिक निर्णय” (Very Bold Judgement) बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला ईमानदार न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बहुत मददगार साबित होगा, जो अक्सर दुर्भावनापूर्ण शिकायतों का शिकार होते हैं।

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कोर्ट ने बार के सदस्यों द्वारा न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ तुच्छ आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर भी गंभीरता से संज्ञान लिया और चेतावनी दी कि ऐसे कृत्यों पर अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:

  1. सितंबर 2015 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द किया।
  2. बर्खास्तगी को सही ठहराने वाले हाईकोर्ट के आदेश को भी खारिज किया।
  3. निर्भय सिंह सुलिया को उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख तक के सभी मौद्रिक लाभों (Monetary Benefits) का भुगतान करने का निर्देश दिया।

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