साल 2026 के आगाज के साथ ही भारत का सुप्रीम कोर्ट कई ऐसे महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई के लिए तैयार है, जिनके फैसले देश के संवैधानिक ढांचे, चुनावी प्रक्रिया और नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर दूरगामी प्रभाव डालेंगे। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से लेकर धार्मिक स्वतंत्रता और डिजिटल गेमिंग के भविष्य तक, इस साल की लिस्टिंग में कई बड़े संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं।
यहाँ हम उन पांच सबसे महत्वपूर्ण मामलों का विश्लेषण कर रहे हैं जिन पर 2026 में सुप्रीम कोर्ट की नजर रहेगी और जिनके फैसलों का इंतजार पूरा देश कर रहा है।
1. ऑनलाइन गेमिंग एक्ट, 2025 को संवैधानिक चुनौती
कानूनी मुद्दा: सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संसद के पास ‘स्किल-बेस्ड’ (कौशल आधारित) ऑनलाइन गेम्स पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। याचिकाकर्ताओं ने ‘प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग एक्ट, 2025’ की धारा 14, 15 और 16 को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि रमी और पोकर जैसे खेल, जिन्हें अदालतों ने ‘कौशल का खेल’ माना है, उन्हें जुए (Gambling) के समान मानना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
पृष्ठभूमि: यह याचिका हेड डिजिटल वर्क्स प्रा. लिमिटेड द्वारा दायर की गई है। सरकार का पक्ष है कि यह कानून ऑनलाइन गेमिंग की लत और मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए लाया गया है। वहीं, गेमिंग उद्योग का कहना है कि कौशल और किस्मत (Chance) के खेलों में अंतर न करना इस पूरे उद्योग को खत्म कर देगा। याचिका में केंद्र सरकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग भी की गई है।
वर्तमान स्थिति: यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। हालांकि अभी कोई निश्चित तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन उम्मीद है कि इस साल कोर्ट इस पर सुनवाई करेगा और अंतरिम राहत समेत संवैधानिक वैधता पर फैसला सुनाएगा।
2. धर्मांतरण विरोधी कानूनों (Anti-Conversion Laws) को चुनौती
कानूनी मुद्दा: सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) और अन्य की याचिकाओं में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड और हरियाणा जैसे राज्यों द्वारा बनाए गए धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती दी गई है। मुख्य कानूनी सवाल यह है कि क्या ये कानून, जो धर्म परिवर्तन और अंतरधार्मिक विवाहों पर कड़े प्रतिबंध लगाते हैं, संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और निजता के अधिकार का हनन करते हैं।
पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि राज्य सरकारों द्वारा किए गए संशोधनों के जरिए धर्म परिवर्तन के लिए पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखल है। गुजरात और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पहले ही कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी थी, जिनमें ‘बर्डन ऑफ प्रूफ’ को पलटने जैसे विवादास्पद नियम शामिल थे। आरोप है कि इन कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को परेशान करने के लिए किया जा रहा है।
वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को जनवरी 2026 में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। कोर्ट ने पहले भी टिप्पणी की थी कि यह मुद्दा गंभीर है और सामाजिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिए इसका निस्तारण जरूरी है।
3. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति अधिनियम, 2023 को चुनौती
कानूनी मुद्दा: याचिकाकर्ताओं ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की वैधता को चुनौती दी है। मुख्य विवाद चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाने को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह सुप्रीम कोर्ट के 2023 के ‘अनूप बरनवाल’ फैसले के खिलाफ है और अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले में कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI होने चाहिए। लेकिन नए कानून के तहत CJI की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं (डॉ. जया ठाकुर और ADR) का कहना है कि सरकार के बहुमत वाली समिति निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा के खिलाफ है।
वर्तमान स्थिति: यह मामला जनवरी 2026 में सुनवाई के लिए तय है। लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से जुड़ा होने के कारण सुप्रीम कोर्ट इसे प्राथमिकता दे सकता है।
4. मतदाता सूची (Electoral Rolls) के विशेष संशोधन (SIR) के खिलाफ याचिका
कानूनी मुद्दा: यह याचिका अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार) के तहत दायर की गई है, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत बिना उचित कारण के लाखों नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे नागरिकों का वोट देने का अधिकार छिन रहा है।
पृष्ठभूमि: शुरुआत में यह मुद्दा बिहार से जुड़ा था, लेकिन बाद में इसे अन्य राज्यों तक बढ़ा दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पक्षपाती तरीके से नाम हटाए जा रहे हैं जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन यह माना था कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए इसकी संवैधानिक जांच जरूरी है।
वर्तमान स्थिति: जनवरी 2026 में इस पर सुनवाई संभावित है। कोर्ट को चुनाव आयोग की शक्तियों और नागरिकों के मताधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा।
5. वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025
कानूनी मुद्दा: करीब 65 याचिकाओं के माध्यम से ‘वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025’ को चुनौती दी गई है। मुख्य आरोप यह है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक समूहों को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। विवाद का केंद्र जिला कलेक्टरों को वक्फ संपत्तियों पर अधिक अधिकार देना और वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना है।
पृष्ठभूमि: सरकार का कहना है कि यह कानून वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाने के लिए है। वहीं, मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि नौकरशाही का हस्तक्षेप समुदाय के संपत्ति अधिकारों को कमजोर करता है। यह कानून वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता पर सीधा हमला माना जा रहा है।
वर्तमान स्थिति: 2026 की शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट ने इसके कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगा दी है, विशेष रूप से कलेक्टर की शक्तियों और बोर्ड के गठन से जुड़े नियमों पर। इस साल विस्तृत सुनवाई के दौरान पूरे अधिनियम की संवैधानिक वैधता परखी जाएगी।

