हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु और आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में पति और उसके परिवार के सदस्यों की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्पीड़न के अस्पष्ट और सामान्य आरोप आपराधिक दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
जस्टिस राकेश कैंथला ने मीनकी देवी और राम पाल द्वारा दायर आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए सत्र न्यायाधीश, कांगड़ा (धर्मशाला) के 30 नवंबर, 2012 के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए (क्रूरता) और धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत आरोपों से बरी कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष का मामला सपना उर्फ किरण की मृत्यु से जुड़ा था, जिनका विवाह 8 मार्च 2007 को आरोपी राम पाल से हुआ था। मृतका के भाई और शिकायतकर्ता कश्मीर सिंह (PW1) के अनुसार, शादी के लगभग एक महीने बाद तक सपना के साथ अच्छा व्यवहार किया गया। इसके बाद, आरोपी राम पाल (पति), मीनकी देवी और संजीव कुमार ने कथित तौर पर दहेज और पैसों की मांग को लेकर उसे परेशान करना और पीटना शुरू कर दिया।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि इस निरंतर उत्पीड़न के कारण सपना ने जहर खा लिया और आत्महत्या कर ली। 2012 में ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के संस्करण को स्वीकार करते हुए कहा था कि गवाहों के बयानों में उत्पीड़न के संबंध में एकरूपता है। नतीजतन, ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 498ए और 306 के तहत दोषी ठहराया था। इस फैसले से व्यथित होकर आरोपियों ने हाईकोर्ट में अलग-अलग अपीलें दायर की थीं।
दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन नहीं किया। बचाव पक्ष ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप “दुखद रूप से अस्पष्ट” (sadly vague) और सामान्य प्रकृति के थे। यह तर्क दिया गया कि क्रूरता का कोई विशिष्ट उदाहरण नहीं दिया गया था और घटना से पहले पंचायत या पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि वैवाहिक जीवन में केवल कलह आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आती है।
राज्य सरकार, जिसका प्रतिनिधित्व अतिरिक्त महाधिवक्ता ने किया, ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि मृत्यु विवाह के सात वर्षों के भीतर हुई है, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113ए के तहत आरोपियों के खिलाफ उपधारणा (presumption) लागू होनी चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
जस्टिस राकेश कैंथला ने सबूतों और उकसाने (abetment) से संबंधित कानूनी स्थिति का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि आईपीसी की धारा 306 के तहत सजा के लिए, “उकसाने” या आरोपी द्वारा किसी “सकारात्मक कृत्य” (positive act) का स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए, जिसने मृतका को आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा हो।
अस्पष्ट आरोपों पर
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत और गवाहों के बयान सामान्य थे और उनमें प्रत्येक आरोपी की भूमिका के बारे में विशिष्टता का अभाव था।
“जब हम शिकायत को देखते हैं, तो यह दुखद रूप से अस्पष्ट है। यह नहीं दर्शाता कि किस आरोपी ने कौन सा अपराध किया है, और अपराध करने में इन अपीलकर्ताओं की सटीक भूमिका क्या है।”
आत्महत्या के लिए उकसाने पर (धारा 306 आईपीसी)
कोर्ट ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि “उकसाने” के लिए मृतका को प्रकोपित करने के लिए एक सक्रिय इरादे (mens rea) की आवश्यकता होती है। जज ने नोट किया कि केवल उत्पीड़न या क्रूरता अपने आप में उकसाने के बराबर नहीं है।
“केवल इसलिए कि पीड़िता को लगातार परेशान किया गया और एक समय पर उसने अपनी जान देने का चरम कदम उठा लिया, इसका परिणाम अपने आप में उकसाने वाले सकारात्मक कृत्य के रूप में नहीं निकल सकता। मेन्स रिया (आपराधिक मनःस्थिति) का पता केवल इससे नहीं लगाया जा सकता कि पीड़िता के दिमाग में क्या चल रहा था।”
साक्ष्य अधिनियम की धारा 113ए पर
विवाहित महिला द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने की उपधारणा के संबंध में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 113ए अदालत को विवेक (“may presume”) देती है, न कि कोई अनिवार्य आदेश (“shall presume”)। कोर्ट ने कहा कि इस उपधारणा को लागू करने के लिए अभियोजन पक्ष को पहले क्रूरता या उत्पीड़न का आधारभूत मामला संदेह से परे साबित करना होगा, जो वह वर्तमान मामले में करने में विफल रहा।
निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ताओं ने मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया या सहायता की। नतीजतन, कोर्ट ने विद्वान सत्र न्यायाधीश, कांगड़ा द्वारा पारित सजा और आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया, “अपीलकर्ताओं/आरोपियों को आईपीसी की धारा 498ए और 306 सहपठित धारा 34 के तहत दंडनीय अपराधों से बरी किया जाता है।”
सीआरपीसी की धारा 437-ए (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 481) के नए प्रावधानों के अनुपालन में, अपीलकर्ताओं को 25,000 रुपये का निजी मुचलका भरने का निर्देश दिया गया, ताकि यदि इस बरी किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की जाती है, तो उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: मीनकी देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (और संबंधित अपील राम पाल और अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य)
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 526 और 528 ऑफ 2012
- कोरम: जस्टिस राकेश कैंथला
- साइटेशन: 2026:HHC:6

