दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत दायर आवेदन को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बंटवारे के मुकदमे में परिसीमा (Limitation) का मुद्दा, जहां वादी यह दलील देता है कि उसे प्रतिकूल स्वामित्व (adverse title) वाले दस्तावेजों की जानकारी बाद में मिली, एक ऐसा मुद्दा है जो कानून और तथ्यों का मिश्रित प्रश्न (mixed question of law and fact) है। इसे मुकदमे की शुरुआती स्टेज पर ही तय नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि वादपत्र (plaint) को सार्थक रूप से पढ़ने पर स्पष्ट ‘वाद का कारण’ (cause of action) प्रकट होता है, जो इस दावे पर आधारित है कि विवादित संपत्तियां संयुक्त परिवार के फंड से अर्जित की गई थीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील अनीता मुंजाल (वादी/प्रतिवादी संख्या 1) द्वारा विभूति जौहरी और त्रिशा जौहरी (अपीलकर्ता/प्रतिवादी संख्या 1 और 2) व अन्य के खिलाफ दायर एक बंटवारे के मुकदमे से उत्पन्न हुई थी। यह विवाद मुख्य रूप से दो संपत्तियों से संबंधित था:
- बाथला प्रॉपर्टी: फ्लैट नंबर 115-डी, बाथला को-ऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड, आई.पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली।
- गुरुग्राम प्रॉपर्टी: प्लॉट नंबर 91, मौलसरी रोड, डीएलएफ कुतुब एन्क्लेव, फेज-III, गुरुग्राम, हरियाणा।
वादी का दावा था कि ये संपत्तियां संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई थीं, जिसमें उनके दिवंगत पिता, श्री डी.डी. जौहरी की संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त आय भी शामिल थी। उनका कहना था कि गुरुग्राम की संपत्ति उनकी दिवंगत मां, श्रीमती कौशल्या और दिवंगत भाई, विनय जौहरी के संयुक्त नाम पर खरीदी गई थी, जबकि बाथला प्रॉपर्टी पूरी तरह से विनय के नाम पर थी। हालांकि, वादी ने तर्क दिया कि बाथला प्रॉपर्टी की बुकिंग के समय विनय केवल 21 वर्ष के थे, छात्र थे और उनकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं था।
वादी ने आगे आरोप लगाया कि 21 फरवरी 2018 को विनय की मृत्यु के बाद बंटवारे की चर्चा शुरू हुई। उनका दावा है कि उन्हें 16 अगस्त 2005 के गिफ्ट डीड (जो कथित तौर पर उनकी मां द्वारा विनय के पक्ष में निष्पादित की गई थी) और अपीलकर्ताओं के विशेष दावों के बारे में केवल 2018 में अन्य दीवानी कार्यवाही के दौरान पता चला।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं ने आदेश VII नियम 11 सीपीसी के तहत वादपत्र को खारिज करने की मांग की थी। उनका कहना था कि वादपत्र में ‘वाद का कारण’ नहीं है और यह परिसीमा (Limitation) द्वारा बाधित है। वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णन वेणुगोपाल ने अपीलकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए तर्क दिया:
- यह मुकदमा पूरी तरह से गलत आधार पर टिका है और चार दशकों से अधिक पुराने दस्तावेजों के विपरीत है।
- दिवंगत पिता ने 6 अप्रैल 1976 को एक वैध वसीयत निष्पादित की थी, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति विनय को दी थी, जिसे वादी ने 1978 में अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देकर स्वीकार किया था।
- दिवंगत मां ने 29 अगस्त 1985 को विनय के पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत निष्पादित की थी।
- 8 जनवरी 1998 की सेल डीड और 16 अगस्त 2005 की गिफ्ट डीड जैसे दस्तावेज़ विनय के स्वामित्व को साबित करते हैं।
- दाहिबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली (2020) मामले का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि दस्तावेजों के साथ पढ़ने पर भी वादपत्र कोई ‘वाद का कारण’ प्रकट नहीं करता।
- यह मुकदमा समय सीमा (Limitation) से बाहर है क्योंकि यह दशकों पहले निष्पादित पंजीकृत दस्तावेजों को चुनौती देता है।
वहीं, प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सम्राट निगम ने तर्क दिया कि वादपत्र को सार्थक रूप से पढ़ने पर इसमें पर्याप्त ‘वाद का कारण’ है। उन्होंने कहा कि परिसीमा की दलील में जानकारी की तारीख (date of knowledge) से जुड़े विवादित तथ्य शामिल हैं, जिन्हें आदेश VII नियम 11 के चरण पर तय नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने दाहिबेन, विनोद इंफ्रा डेवलपर्स लिमिटेड और करम सिंह सहित सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए आदेश VII नियम 11 सीपीसी के दायरे पर चर्चा की।
वाद का कारण (Cause of Action) पर: खंडपीठ ने कहा कि आदेश VII नियम 11 के चरण में, कोर्ट को यह मानकर चलना चाहिए कि वादपत्र में किए गए दावे सत्य हैं। कोर्ट ने कहा:
“वादपत्र को सावधानीपूर्वक और सार्थक रूप से पढ़ने पर पता चलता है कि वादी ने ‘वाद के कारण’ का गठन करने वाले मूलभूत तथ्यों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। वादपत्र में विशिष्ट और स्पष्ट दावे हैं कि मुकदमे की संपत्तियां संयुक्त परिवार के फंड से और दिवंगत पिता की संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त आय से अर्जित की गई थीं।”
कोर्ट ने आगे कहा कि यदि इन दलीलों को सही माना जाता है और साक्ष्य में साबित किया जाता है, तो वादी को सह-हि हिस्सेदार के रूप में संपत्तियों में स्पष्ट अधिकार मिलेगा।
परिसीमा (Limitation) पर: परिसीमा के तर्क पर कोर्ट ने कहा कि यह मुकदमा बंटवारे के लिए है, न कि विशेष रूप से टाइटल डीड्स को रद्द करने के लिए।
“बंटवारे की मांग करने वाले मुकदमे के लिए परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची में किसी भी अनुच्छेद के तहत विशेष रूप से कोई समय सीमा नहीं दी गई है। नतीजतन, यह दावा अवशिष्ट प्रावधान (residuary provision), यानी अनुच्छेद 113 द्वारा शासित होता है… यह तय कानून है कि बंटवारे के मुकदमे में ‘वाद का कारण’ एक आवर्ती प्रकृति (recurring nature) का होता है और जब तक संयुक्त स्थिति बनी रहती है, तब तक जारी रहता है।”
कोर्ट ने वादी की इस दलील को स्वीकार किया कि उन्हें 2005 की गिफ्ट डीड की जानकारी केवल 2018 की कार्यवाही के दौरान मिली।
“इसलिए, परिसीमा का प्रश्न कानून और तथ्यों का मिश्रित प्रश्न बन जाता है, जिसका निर्णय पक्षों द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद ही किया जा सकता है।”
निर्णय
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि वादपत्र में स्पष्ट ‘वाद का कारण’ है और मांगी गई राहत को इस चरण पर परिसीमा द्वारा बाधित नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा।
केस विवरण:
- केस टाइटल: विभूति जौहरी और अन्य बनाम अनीता मुंजाल और अन्य
- केस नंबर: FAO(OS) 145/2025
- कोरम: न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर
- अपीलकर्ताओं के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कृष्णन वेणुगोपाल (साथ में सुश्री प्रीति शर्मा, श्री शिखर शांत, श्री अश्विनी कौशिक और सुश्री उमंग मोतियानी)।
- प्रतिवादियों के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सम्राट निगम (साथ में श्री अजय डबास, श्री आनंद डबास, सुश्री प्रियंका डागर, सुश्री अर्पिता रावत, श्री रवि डागर और श्री ऋषिकेश)।

