यूपी और केरल में मतदाता सूची पुनरीक्षण की समयसीमा बढ़ाने पर विचार करे चुनाव आयोग: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से कहा कि उत्तर प्रदेश और केरल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की समयसीमा बढ़ाने की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस फैसले में जमीनी हकीकतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि अकेले उत्तर प्रदेश में करीब 25 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। उन्होंने कुछ मामलों की ओर इशारा करते हुए कहा कि कई जगह पति का नाम सूची में बना हुआ है, जबकि पत्नी का नाम हटा दिया गया है। सिब्बल ने यह भी कहा कि पुनरीक्षण की समयसीमा जल्द समाप्त होने वाली है।

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार चुनाव आयोग का है और यह भी बताया कि पुनरीक्षण के लिए पहले ही समय बढ़ाया जा चुका है।

सुनवाई के दौरान एक अन्य वकील ने पुनरीक्षण की जल्दबाजी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं, इसके बावजूद आयोग पर्याप्त समय दिए बिना प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है।

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पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोई सीधा आदेश पारित नहीं किया, लेकिन चुनाव आयोग से कहा कि समय बढ़ाने से संबंधित किसी भी प्रतिवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक फैसला लिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अंतिम सुनवाई 6 जनवरी के लिए टाल दी है। उस दिन चुनाव आयोग की ओर से राकेश द्विवेदी अंतिम बहस की शुरुआत करेंगे।

इससे पहले, 11 दिसंबर को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक ने कहा था कि चुनाव आयोग मतदाताओं के साथ “संदेह करने वाले पड़ोसी” या “पुलिस” की तरह व्यवहार नहीं कर सकता। उस दिन वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने याचिकाकर्ताओं की ओर से विस्तृत दलीलें रखीं और विशेष गहन पुनरीक्षण की अवधारणा पर ही सवाल उठाया।

रामचंद्रन ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व मताधिकार को सुगम बनाना है, न कि उसे बाधित करना। उन्होंने कहा कि जब नागरिकता से जुड़ी एक पर्याप्त वैधानिक व्यवस्था पहले से मौजूद है, तो चुनाव आयोग बूथ लेवल अधिकारियों को मतदाताओं पर संदेह करने के निर्देश देकर “निगरानी करने वाला” संस्थान नहीं बन सकता।

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इससे पहले की सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रश्न भी उठाया था कि क्या चुनाव आयोग किसी संदिग्ध नागरिक के मामले में जांच करने से पूरी तरह वंचित है, या फिर ऐसी जांच उसकी संवैधानिक शक्तियों के दायरे में आती है।

अब इस संवेदनशील मुद्दे पर अदालत जनवरी में विस्तार से सुनवाई करेगी।

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