जासा जासूसी का आरोप साबित नहीं; ब्रह्मोस इंजीनियर निशांत अग्रवाल की आजीवन कारावास की सज़ा रद्द: बॉम्बे हाई कोर्ट

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व इंजीनियर निशांत अग्रवाल को जासूसी के आरोप में सुनाई गई आजीवन कारावास की सज़ा को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि उन्होंने भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या हितों के खिलाफ कोई कार्रवाई की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने उन पर लापरवाही का दोष कायम रखा है।

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और प्रवीण पाटिल की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो दिखाए कि अग्रवाल ने समाज में भय फैलाने या देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाली किसी गतिविधि में भाग लिया हो।

अग्रवाल को 2018 में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI को जानकारी देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जून 2023 में सत्र न्यायालय ने उन्हें आईटी एक्ट और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (OSA) के तहत आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी।

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हाई कोर्ट ने अब इन सभी गंभीर धाराओं के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है और केवल धारा 5(1)(d) OSA—संवेदनशील जानकारी की उचित सुरक्षा में लापरवाही—का दोष बरकरार रखा है। इस अपराध के लिए तीन वर्ष की सज़ा बनी रहेगी। अदालत ने कहा कि अग्रवाल को पहले से बिताई गई हिरासत अवधि का सेट-ऑफ मिलेगा।

पीठ ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में नाकाम रहा कि अग्रवाल का कोई ऐसा उद्देश्य था जो राज्य की सुरक्षा या हितों के लिए हानिकारक हो।

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि अग्रवाल की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) हमेशा “बहुत अच्छी” और “उत्कृष्ट” रही। उन्हें सीनियर सिस्टम इंजीनियर के पद पर पदोन्नति मिली थी और प्रदर्शन के आधार पर यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ था।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अग्रवाल के पास अपने कार्यकाल के दौरान अत्यंत संवेदनशील डेटा तक पहुंच थी, फिर भी ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला कि उन्होंने कार्यालय के कंप्यूटर में उपलब्ध किसी जानकारी के साथ छेड़छाड़ की हो या उसका दुरुपयोग किया हो।

रिकॉर्ड के अनुसार, अग्रवाल 2014 से 2018 के बीच भारतीय सशस्त्र बलों को 70–80 ब्रह्मोस मिसाइलें सौंपने वाली कोर टीम का हिस्सा थे।

अदालत ने उस कथित संचार की भी जांच की जिसे अभियोजन ने प्रमुख सबूत के रूप में प्रस्तुत किया था—अग्रवाल की चैटिंग “सीजल कपूर” नामक व्यक्ति के साथ।

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पीठ ने कहा कि चैट-लॉग यह दिखाते हैं कि यह बातचीत विदेश में नौकरी के इंटरव्यू को लेकर थी। इसमें अग्रवाल ने अपना बायोडाटा साझा किया और ब्रिटेन के एविएशन सेक्टर में संभावित नौकरी के लिए आवेदन डाउनलोड किए। कोर्ट के अनुसार, इससे जासूसी का कोई संकेत नहीं मिलता।

सभी तथ्य और साक्ष्य परखने के बाद अदालत ने कहा कि उसे “कोई हिचक” नहीं है यह कहने में कि धारा 5(1)(d) OSA के तहत लापरवाही वाला अपराध छोड़कर अन्य कोई आरोप साबित नहीं हुआ।

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पीठ ने कहा, “अन्य कोई अपराध, जिसके तहत अभियुक्त पर मुकदमा चलाया गया था, अभियोजन द्वारा साबित नहीं हो पाया।”

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