फायर सेफ्टी: सूरत अग्निकांड पीड़ित की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, केंद्र सरकार और NDMA को नोटिस जारी

देश भर में फायर सेफ्टी (अग्नि सुरक्षा) और आपातकालीन सेवाओं में मौजूद गंभीर खामियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को नोटिस जारी कर पूछा है कि देश में फायर सर्विसेज और रोड इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम में मैनपावर और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।

एक पिता के संघर्ष से जागी उम्मीद

इस मामले की सुनवाई एक बेहद भावुक पृष्ठभूमि पर आधारित है। याचिकाकर्ता एक पिता हैं, जिन्होंने 2019 में गुजरात के सूरत में हुए भीषण अग्निकांड में अपनी बेटी को खो दिया था। उन्होंने कोर्ट में स्वयं उपस्थित होकर (party-in-person) अपनी दलीलें रखीं।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि ‘नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया 2016’ का सख्ती से पालन नहीं किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप देश भर में लगातार आग लगने की घटनाएं हो रही हैं और मासूम लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।

याचिका में की गई प्रमुख मांगें

याचिका में केवल मुआवजे की मांग नहीं की गई है, बल्कि सिस्टम में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश देने की अपील की गई है:

  • जवाबदेही डैशबोर्ड (Accountability Dashboard): आपातकालीन प्रतिक्रिया (Emergency Response) की उपलब्धता और प्रदर्शन पर नजर रखने के लिए एक राष्ट्रव्यापी डैशबोर्ड स्थापित किया जाए।
  • अनिवार्य ऑडिट: जिला स्तर पर फायर रिस्क ऑडिट (Fire Risk Audit) को अनिवार्य बनाया जाए और इसकी रिपोर्ट को जनता के लिए सार्वजनिक किया जाए।
  • उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग: NDMA और फायर सर्विसेज के नियमों के पालन की निगरानी के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन हो, जो लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सके।
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संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षा का अधिकार

याचिका में एक बहुत ही महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी उठाया गया है। इसमें मांग की गई है कि ‘आपातकालीन सुरक्षा और प्रतिक्रिया के अधिकार’ (Right to emergency protection and response) को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का अभिन्न अंग माना जाए। इसके लिए कोर्ट से संवैधानिक संशोधन या न्यायिक व्याख्या की सिफारिश करने का अनुरोध किया गया है।

एक समान मुआवजा और फास्ट-ट्रैक ट्रिब्यूनल

याचिकाकर्ता ने इस बात पर जोर दिया कि आपदा से होने वाली मौतों के लिए पूरे देश में एक ‘समान राष्ट्रीय वित्तीय मुआवजा तंत्र’ (Uniform National Financial Compensation Mechanism) होना चाहिए, ताकि हर भारतीय नागरिक को समान गरिमा और सुरक्षा मिल सके।

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इसके अलावा, याचिका में मांग की गई है कि:

  1. त्रासदी से जुड़े पीड़ितों के मामलों, विशेषकर जो तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं, उनके लिए एक नेशनल स्पेशल बेंच या ट्रिब्यूनल का गठन किया जाए।
  2. विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power) को निर्देश दिया जाए कि बिजली के बुनियादी ढांचे के रखरखाव के लिए तिमाही सुरक्षा ऑडिट और पब्लिक अलर्ट सिस्टम लागू किए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नोटिस जारी किया है और अब केंद्र सरकार को चार हफ्तों के भीतर अपना पक्ष रखना होगा।

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