दिल्ली में खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तात्कालिक निर्देश देने की मांग करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। ग्रेटर कैलाश-II वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दायर इस याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि राजधानी की बिगड़ती हवा को नियंत्रित करने के लिए त्वरित, प्रभावी और वैज्ञानिक अल्पकालिक व दीर्घकालिक उपाय लागू किए जाएं।
याचिका में राजधानी की लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता का मुद्दा उठाया गया
याचिका के अनुसार, पिछले कई वर्षों में दिल्ली की हवा “गंभीर रूप से खराब” हुई है और AQI अक्सर “बहुत खराब”, “गंभीर” और यहां तक कि “खतरनाक” श्रेणी में पहुंच जाता है, खासतौर पर सर्दी के महीनों में। इसका सीधा असर नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, जिससे बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और पहले से बीमार लोगों में गंभीर श्वसन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ी हैं।
प्राधिकारियों पर निष्क्रियता और केवल ‘कागज़ी कदमों’ का आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया है कि वायु गुणवत्ता लगातार गिरती रही, लेकिन संबंधित प्राधिकरण “लगभग निष्क्रिय” बने रहे। कहा गया है कि “स्टेज-III” के कदम तब जारी किए गए जब AQI पहले ही गंभीर सीमा पार कर चुका था।
याचिकाकर्ता के अनुसार सरकार और एजेंसियों ने केवल कागज़ पर उपाय तय किए, लेकिन उनका वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया गया। ऐसी “देरी से और सतही कार्रवाई” ने स्थिति को और बिगाड़ा और लोगों के जीवन तथा स्वास्थ्य को “लापरवाही से खतरे में डाल दिया”।
‘रेड अलर्ट’ के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं: याचिकाकर्ता
याचिका में बताया गया है कि विशेषज्ञों ने 21 नवंबर को राजधानी की हवा को “जीवन-घातक” बताते हुए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया था, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस, प्रभावी या पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ता द्वारा संबंधित प्राधिकरणों को भेजे गए कई प्रतिवेदन भी बेनतीजा रहे।
इन एजेंसियों को बनाया गया पक्षकार
याचिका में निम्नलिखित प्राधिकरणों को प्रतिवादी बनाया गया है:
- दिल्ली सरकार
- दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
- वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग
- नगर निगम दिल्ली
- दिल्ली पुलिस

