आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट: पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन के तहत सरप्लस जमीन के नियमितीकरण की जांच बहाल, सिंगल जज का आदेश रद्द

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत सरप्लस जमीन के नियमितीकरण में कथित अनियमितताओं की जांच को रोकने वाले सिंगल जज के आदेश को खारिज कर दिया है। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ (Division Bench) ने राज्य सरकार द्वारा दायर रिट अपीलों को स्वीकार करते हुए G.O.Ms.No.557 को बहाल कर दिया है, जिसके तहत कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किए गए भूमि आवंटन की जांच के आदेश दिए गए थे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक संपत्ति के निपटान से जुड़े मामलों में जांच को केवल पक्षपात की आशंका के आधार पर नहीं रोका जा सकता। हाईकोर्ट ने इस मामले में ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ (Public Trust Doctrine) को लागू करते हुए कहा कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक संपत्ति का ट्रस्टी है और उसे जनहित की रक्षा करनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि (Background)

यह विवाद विशाखापत्तनम के वाल्टेयर वार्ड में स्थित सरप्लस जमीन के नियमितीकरण से जुड़ा है। मूल रूप से यह जमीन अडापल्ली वेंकटप्पया शास्त्री की थी, जिसे अर्बन लैंड (सीलिंग एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1976 (ULC Act) के तहत सरप्लस घोषित किया गया था और यह राज्य सरकार में निहित हो गई थी।

याचिकाकर्ताओं, पिन्नमराजू वेंकटपति राजू और कासी नागा कनक ब्रह्मम ने दावा किया कि उन्होंने 1983 और 1987 में मूल मालिक से क्रमशः 2,752 वर्ग मीटर और 2,879 वर्ग मीटर जमीन खरीदी थी। उन्होंने G.O.Ms.No.455 दिनांक 29.07.2002 के तहत नियमितीकरण के लिए आवेदन किया, जो कब्जे वाले तीसरे पक्ष को अतिरिक्त भूमि आवंटित करने की अनुमति देता था। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने 2006 में G.O.Ms.No.256 और G.O.Ms.No.424 जारी कर उनके पक्ष में जमीन को नियमित कर दिया।

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हालांकि, बाद में आरोप लगे कि नियमितीकरण की शर्त (ढांचे/स्ट्रक्चर का अस्तित्व) को पूरा करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने फर्जी टैक्स रसीदें पेश की थीं। सरकार ने शुरू में इन आदेशों को स्थगित (abeyance) रखा, लेकिन बाद में याचिकाकर्ताओं द्वारा उच्च स्लैब रेट का भुगतान करने पर G.O.Ms.No.493 दिनांक 26.03.2008 के माध्यम से स्थगन आदेश वापस ले लिया गया।

2012 में, विधान परिषद में “अवैध नियमितीकरण” का मुद्दा उठने के बाद, सरकार ने G.O.Ms.No.557 जारी किया और मामले की जांच के लिए मुख्य भूमि प्रशासन आयुक्त (CCLA) को जांच अधिकारी नियुक्त किया। याचिकाकर्ताओं ने इस जांच को चुनौती दी, और 21.03.2014 को एक सिंगल जज ने जांच को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि जांच अधिकारी ने मामले को पहले ही पूर्वाग्रह (prejudge) से देख लिया था।

पक्षकारों की दलीलें

राज्य सरकार (अपीलकर्ता):

  • राज्य ने तर्क दिया कि G.O.Ms.No.455 विशिष्ट शर्तों के बिना एकल व्यक्तियों के पक्ष में नियमितीकरण की अनुमति नहीं देता है।
  • विशेष सरकारी वकील ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने जाली टैक्स रसीदें जमा की थीं और वे जमीन के हकदार नहीं थे।
  • राज्य का कहना था कि केवल उच्च स्लैब रेट का भुगतान करने से नियमितीकरण वैध नहीं हो जाता, यदि मूल पात्रता यानी खरीद का पंजीकृत दस्तावेज (Registered Document) ही न हो।

प्रतिवादी (रिट याचिकाकर्ता):

  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि चूंकि सरकार ने स्थगन आदेश वापस ले लिया था और भुगतान स्वीकार कर लिया था, इसलिए मामले को दोबारा नहीं खोला जा सकता।
  • उन्होंने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने 28.05.2013 के अपने पत्र में ऐसे विचार व्यक्त किए थे जिससे लगता है कि उन्होंने पहले ही मान लिया था कि धोखाधड़ी हुई है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

खंडपीठ ने ULC एक्ट की धारा 23 और G.O.Ms.No.455 के दिशा-निर्देशों की गहन जांच की।

1. वैधानिक अनुपालन (Statutory Compliance): कोर्ट ने पाया कि G.O.Ms.No.455 में स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया गया था कि “बिना किसी पंजीकृत खरीद दस्तावेज के रिक्त सरप्लस भूमि के आवंटन पर विचार नहीं किया जाएगा।” बेंच ने नोट किया कि याचिकाकर्ता मूल मालिक से कोई भी पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deed) पेश करने में विफल रहे। यहां तक कि मेसर्स क्लोवर एसोसिएट्स (P) लिमिटेड के साथ किए गए समझौतों में भी उन्होंने स्वीकार किया था कि उनके पास ऐसा कोई पंजीकृत दस्तावेज नहीं है।

2. पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन (Public Trust Doctrine): हाईकोर्ट ने ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन’ का हवाला देते हुए कहा:

“पब्लिक ट्रस्ट का सिद्धांत राज्य के अधिकार पर एक अंतर्निहित रोक लगाता है कि वह सार्वजनिक संपत्ति को निजी पार्टी को हस्तांतरित नहीं कर सकता यदि ऐसा हस्तांतरण जनहित को प्रभावित करता है। यह सिद्धांत प्राकृतिक संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन के लिए राज्य द्वारा सकारात्मक कार्रवाई की मांग करता है।”

बेंच ने माना कि जांच कराने का निर्णय इस सिद्धांत के अनुरूप था। जजों ने कहा कि जहां वैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन और पब्लिक ट्रस्ट के हनन का प्रश्न हो, वहां जांच होनी चाहिए और उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए।

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3. पूर्वाग्रह और जांच (Prejudgment and Bias): सिंगल जज के इस निष्कर्ष पर कि जांच अधिकारी ने मुद्दे को पूर्व-निर्णित कर लिया था, खंडपीठ ने कहा कि यदि पूर्वाग्रह की आशंका थी, तो उचित उपाय अधिकारी को बदलना था, न कि जांच को ही रद्द करना।

“यदि एक सामान्य व्यक्ति मौजूदा परिस्थितियों के आधार पर यह सोचता है कि अधिकारी के पूर्वाग्रही होने की संभावना है… तो सबसे बेहतर स्थिति में जांच अधिकारी को बदलने का निर्देश दिया जा सकता था, लेकिन जांच को रोकने और G.O.Ms.No.557 को रद्द करने का नहीं।”

निष्कर्ष और निर्देश

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रिट अपील संख्या 1090, 1106 और 1218 (वर्ष 2014) को स्वीकार करते हुए 21.03.2014 के सामान्य निर्णय को रद्द कर दिया।

अदालत ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. जांच बहाल: G.O.Ms.No.557 को फिर से जीवित (Revive) किया जाता है।
  2. नया जांच अधिकारी: राज्य सरकार जांच करने के लिए CCLA रैंक या उसके समकक्ष किसी अन्य अधिकारी को नियुक्त करेगी।
  3. प्रक्रिया: याचिकाकर्ताओं को भाग लेने का पूरा अवसर दिया जाएगा, और जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में राज्य सरकार को सौंपी जाएगी।
  4. समय सीमा: यह पूरी प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मेसर्स क्लोवर एसोसिएट्स से जुड़े अन्य मामलों (भवन निर्माण अनुमति आदि) का भविष्य इस जांच के अंतिम परिणाम पर निर्भर करेगा।

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