इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने 1980 के एक गैर-इरादतन हत्या (Homicide) के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) आरोपियों के शरीर पर आई चोटों को स्पष्ट करने में विफल रहा और घटना की वास्तविक उत्पत्ति (Genesis of the incident) को छिपाया है।
न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने एकमात्र जीवित अपीलकर्ता, राम जियावन द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने अन्य सह-आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर की गई सरकारी अपील को भी खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि (Background)
यह मामला फैजाबाद जिले के महाराजगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम बिजरा में 27 नवंबर, 1980 को हुई एक घटना से संबंधित है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, वादी हनुमान प्रसाद, अपने पिता राम अवतार (मृतक) और चाचा ज्वाला प्रसाद के साथ खेत जोत रहे थे। उनका दावा था कि उन्होंने यह खेत कल्लू पांडेय नामक व्यक्ति से गिरवी (Mortgage) पर लिया था। आरोप है कि तभी शंभू प्रसाद, राजा राम, बिरजा प्रसाद, माया राम, लल्लू उर्फ रामानंद और राम जियावन वहां लाठी और फरसा लेकर पहुंचे। शंभू प्रसाद की ललकार पर आरोपियों ने पीड़ितों पर हमला कर दिया, जिससे राम अवतार की मृत्यु हो गई और हनुमान व ज्वाला प्रसाद घायल हो गए।
अभियोजन का विशिष्ट दावा था कि आरोपी बिरजा ने मृतक के सिर पर ‘फरसे’ से वार किया था, जबकि अन्य लोगों ने लाठियों का इस्तेमाल किया था।
सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge), फैजाबाद ने 30 अक्टूबर, 1982 को अपने फैसले में आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग-II (गैर-इरादतन हत्या), धारा 147 (बलवा) और धारा 323 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। दिलचस्प बात यह है कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य आरोपी बिरजा को सभी आरोपों से बरी कर दिया था, जबकि उस पर फरसे से जानलेवा हमला करने का आरोप था।
हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान छह में से पांच अपीलकर्ताओं की मृत्यु हो गई, जिससे राम जियावन ही एकमात्र जीवित अपीलकर्ता बचे थे।
पक्षों की दलीलें (Arguments)
अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) श्री राजेश कुमार द्विवेदी ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया। बचाव पक्ष का कहना था कि आरोपी जयराम ने विवादित भूखंड का बैनामा (Sale Deed) कराया था और वह उस पर काबिज था। उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता पक्ष ने ही हमला किया था जब जयराम खेत जोत रहा था, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों के बीच ‘फ्री फाइट’ हुई और दोनों तरफ के लोग घायल हुए।
बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि तीन आरोपियों—जयराम, बिरजा और राम जियावन—को भी चोटें आई थीं, जिनका मेडिकल परीक्षण डॉ. हरनाम सिंह (DW-2) द्वारा किया गया था और ट्रायल के दौरान इसे साबित भी किया गया था। हालांकि, अभियोजन पक्ष के गवाहों ने आरोपियों को कोई भी चोट लगने से पूरी तरह इनकार किया।
इसके अलावा, बचाव पक्ष ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर इशारा किया: जबकि सभी चश्मदीद गवाहों ने दावा किया कि बिरजा ने मृतक को ‘फरसे’ से मारा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कटने का कोई घाव (Incised wound) नहीं मिला, बल्कि केवल कुचले जाने के निशान (Lacerated wounds/Contusions) पाए गए जो किसी भारी और भोथरे हथियार (Blunt object) से ही संभव थे।
वहीं, राज्य की ओर से पेश ए.जी.ए. श्री शिव नाथ तिलहरी ने सजा का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि चश्मदीद गवाह विश्वसनीय हैं और आरोपियों की चोटें मामूली थीं, जिन्हें स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर विसंगतियां पाईं।
1. मेडिकल रिपोर्ट और चश्मदीद गवाहों में विरोधाभास खंडपीठ ने पाया कि तीनों चश्मदीद गवाहों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि बिरजा ने मृतक के सिर पर फरसे से वार किया। हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट में फरसे से लगने वाली कोई चोट नहीं मिली। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“मृतक के सिर या अन्य दो घायलों के शरीर पर फरसे की कोई चोट न मिलना… और इसी आधार पर बिरजा का बरी होना… यह परिस्थिति अभियोजन की कहानी की सत्यता पर गंभीर सवाल खड़े करती है और इसे संदेह के दायरे में लाती है।”
2. आरोपियों की चोटों को छिपाना कोर्ट ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया कि तीन आरोपियों को चोटें आई थीं, जिन्हें बचाव पक्ष ने साबित भी किया था। लेकिन अभियोजन पक्ष के गवाहों ने इसे सिरे से नकार दिया। न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता ने फैसले में कहा:
“उक्त घायल गवाह पूरा सच नहीं बता रहा है और घटना की वास्तविक उत्पत्ति (Genesis) को छिपा रहा है, जिससे उसकी गवाही संदिग्ध हो जाती है।”
कोर्ट ने माना कि आरोपियों की चोटों को समझाने में विफलता यह दर्शाती है कि अभियोजन पक्ष ने घटना की शुरुआत कैसे हुई, इस तथ्य को दबाया है।
3. कानूनी नज़ीर (Legal Precedents) कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (भगवान सहाय बनाम राजस्थान राज्य और पंकज बनाम राजस्थान राज्य) का हवाला देते हुए इस सिद्धांत को दोहराया कि “जब घटना की उत्पत्ति और तरीका ही संदिग्ध हो, तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
4. ट्रायल कोर्ट का फैसला ‘विकृत’ (Perverse) हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस तर्क की आलोचना की जिसमें कहा गया था कि चूंकि अभियोजन पक्ष को अधिक गंभीर चोटें आई हैं, इसलिए बचाव पक्ष की चोटों को नजरअंदाज कर सजा दी जा सकती है। खंडपीठ ने इस निष्कर्ष को “स्पष्ट रूप से अवैध, विकृत और त्रुटिपूर्ण” करार दिया।
फैसला (Decision)
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने घटना की असलियत छिपाई और मेडिकल साक्ष्य चश्मदीद गवाहों के बयानों से मेल नहीं खाते। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने अपीलकर्ता को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of doubt) दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया:
“एकमात्र जीवित अपीलकर्ता राम जियावन संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं।”
इस प्रकार, अपील स्वीकार कर ली गई और राम जियावन की सजा को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने उनके जमानत मुचलके भी रद्द कर दिए। इसके साथ ही, 1983 में राज्य द्वारा दायर सरकारी अपील को खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने एमिकस क्यूरी को उनकी सहायता के लिए 10,000 रुपये का मानदेय देने का भी निर्देश दिया।

