सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए 1980 में संपन्न हुए एक विवाह को भंग कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि पक्षकार पिछले लगभग 30 वर्षों से अलग रह रहे हैं और विवाह पूरी तरह से टूट चुका है (Irretrievable Breakdown of Marriage)।
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता-पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट के 3 सितंबर, 2024 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने बदायूं, उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश के 28 अप्रैल, 2004 के आदेश की पुष्टि की थी। निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने इस आधार पर पति की विवाह विच्छेद की याचिका खारिज कर दी थी कि प्रतिवादी-पत्नी की ओर से क्रूरता (Cruelty) या परित्याग (Desertion) साबित नहीं हुआ था।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता-पति की ओर से पेश विद्वान अधिवक्ता श्री रंजन मुखर्जी ने दलील दी कि विवाह वर्ष 1980 में हुआ था। पत्नी बीच-बीच में ससुराल आती रही, लेकिन वर्ष 1995 के बाद से दंपत्ति “एक भी दिन के लिए” साथ नहीं रहे हैं।
वकील ने तर्क दिया कि भले ही निचली अदालतों ने इस आधार पर तलाक देने से इनकार कर दिया कि क्रूरता साबित नहीं हुई थी—यह देखते हुए कि पत्नी ने आपराधिक मामले वापस ले लिए थे—लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि विवाह समाप्त हो चुका है। यह भी बताया गया कि प्रतिवादी-पत्नी ने हाईकोर्ट के समक्ष उपस्थित नहीं होने का विकल्प चुना और नोटिस तामील कराने के प्रयासों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में भी पेश नहीं हुई।
पत्नी की ओर से कोई प्रतिनिधित्व नहीं किया गया। कोर्ट ने नोट किया कि 22 जुलाई, 2025 के अपने पिछले आदेश में, उसने याचिकाकर्ता को ‘दस्ती नोटिस’ (dasti notice) तामील कराने की अनुमति दी थी और स्पष्ट निर्देश दिया था कि यदि पत्नी आर्थिक तंगी का सामना कर रही है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट कानूनी सेवा समिति (Supreme Court Legal Services Committee) के माध्यम से कानूनी सहायता प्राप्त करने के उसके अधिकार के बारे में सूचित किया जाए। इन उपायों के बावजूद, पत्नी ने उपस्थिति दर्ज नहीं कराई।
कोर्ट की टिप्पणियाँ और विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “तथ्य स्वयं बोलते हैं” (facts speak for themselves), यह रेखांकित करते हुए कि यह निर्विवाद है कि पक्षकार 1995 से साथ नहीं रह रहे हैं।
पत्नी की अनुपस्थिति के संबंध में, पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“उपर्युक्त परिस्थितियों में, जब प्रतिवादी-पत्नी ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष चुनौती का विरोध किया था, लेकिन उसके बाद मुकदमा न लड़ने का विकल्प चुना, यह पर्याप्त सबूत है कि उसे तलाक के मुद्दे को आगे बढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। इससे यह अगली धारणा बनती है कि उसे रिश्ते की बहाली (restoration of relationship) में भी कोई दिलचस्पी नहीं है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि पत्नी द्वारा आपराधिक मामले वापस लेना और कोई नया मामला दर्ज न करना यह दर्शाता है कि “उसे मामले को आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं है।”
निर्णय
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि विवाह के अपूरणीय रूप से टूटने के आधार पर तलाक की डिक्री प्रदान करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का आह्वान करने का मामला बनता है, ताकि “वर्तमान मुद्दे को शांत किया जा सके।”
अपील को स्वीकार करते हुए, कोर्ट ने प्रतिवादी-पत्नी के लिए वित्तीय सहायता का मार्ग खुला रखा। आदेश में कहा गया:
“यदि प्रतिवादी-पत्नी को लगता है कि उसे स्थायी गुजारा भत्ता (permanent alimony) या अन्यथा किसी वित्तीय सहायता की आवश्यकता है, तो वह इसके लिए इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र होगी।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कदम आदेश की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर उठाया जाना चाहिए। कोर्ट ने बदायूं की जिला विधिक सेवा समिति को निर्देश दिया कि यदि पत्नी गुजारा भत्ता के लिए आवेदन करना चाहे तो उसे सहायता प्रदान करने के लिए सुप्रीम कोर्ट कानूनी सेवा समिति के साथ समन्वय करे।
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: श्री सर्वेश कुमार शर्मा बनाम श्रीमती सर्वेश कुमारी शर्मा
- केस नंबर: सिविल अपील (SLP(C) No. 10130 of 2025 से उद्भूत)
- कोरम: न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन

