‘खराब सड़कों का कोई औचित्य नहीं’: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गड्ढों से हुई मौतों पर 6 लाख रुपये मुआवज़े का आदेश दिया, जवाबदेही तय करने के निर्देश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई की सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर राज्य सरकार और स्थानीय निकायों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि भारत की वित्तीय राजधानी में “खराब और असुरक्षित सड़कों का कोई औचित्य नहीं हो सकता।” अदालत ने गड्ढों या खुले मैनहोल के कारण हुई मौतों के मामलों में 6 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया और अधिकारियों तथा ठेकेदारों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने पर ज़ोर दिया।

न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति संदेश पाटिल की खंडपीठ ने सड़क सुरक्षा से जुड़ी याचिकाओं के समूह पर सुनवाई करते हुए कहा कि गड्ढों और खुले मैनहोल के कारण होने वाले हादसे और मौतें “नियमित घटना” बन चुकी हैं, खासकर बरसात के दौरान, और यह लगातार लापरवाही नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

अदालत ने निर्देश दिया कि गड्ढों या खुले मैनहोल के कारण मृत्यु के मामलों में 6 लाख रुपये का मुआवज़ा पीड़ित के परिजनों को दिया जाएगा। चोट के मामलों में, चोट की गंभीरता के अनुसार 50,000 रुपये से 2,50,000 रुपये तक का मुआवज़ा दिया जाएगा।

मुआवज़े की राशि निर्धारित करने के लिए एक समिति बनाई जाएगी जिसमें नगर निगम आयुक्त और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव शामिल होंगे।

पीठ ने कहा कि राज्य की एजेंसियों और स्थानीय निकायों पर नागरिकों की सुरक्षा, सुविधा और कल्याण सुनिश्चित करने का संवैधानिक और कानूनी दायित्व है, जिसमें उचित परिवहन साधनों और सड़कों की उपलब्धता भी शामिल है।

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“खराब और असुरक्षित सड़कों का कोई औचित्य नहीं हो सकता। मुंबई, जो देश की वित्तीय राजधानी है, केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों को भारी राजस्व प्रदान करती है,” अदालत ने कहा।

अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है, और अच्छी व सुरक्षित सड़कें इस अधिकार का एक अविभाज्य हिस्सा हैं।

“सड़कें उचित स्थिति में होना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है,” अदालत ने जोड़ा।

पीठ ने कहा कि टोल और अन्य माध्यमों से क़रोड़ों रुपये वसूलने के बावजूद सड़कों की बदतर हालत गंभीर प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाती है।

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“यह उच्च समय है कि गड्ढों के कारण मौत या चोट झेलने वाले पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवज़ा दिया जाए। तभी संबंधित एजेंसियों को चेतावनी मिलेगी,” अदालत ने टिप्पणी की।

न्यायाधीशों ने पाया कि 2015 से कई आदेशों के बावजूद अधिकारी गंभीरता से कार्रवाई करने में नाकाम रहे हैं।

“हर साल वही समस्याएं दोहराई जाती हैं। जब तक नगर निकायों को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, यह दुखद स्थिति हर वर्ष जारी रहेगी,” अदालत ने कहा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जवाबदेही केवल ठेकेदारों पर नहीं, बल्कि अधिकारियों पर भी तय की जानी चाहिए। दोषपूर्ण या घटिया कार्य के लिए जिम्मेदार ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

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“जब तक जिम्मेदार लोगों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा और उन्हें अपनी जेब से नुकसान की भरपाई करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, तब तक वे इस समस्या की गंभीरता नहीं समझेंगे,” अदालत ने चेतावनी दी।

अदालत ने कहा कि बार-बार प्रभावी तंत्र बनाने के आश्वासन देने के बावजूद सड़कों की स्थिति हर साल बिगड़ती जा रही है।

“हकीकत यह है कि सड़कों की हालत हर मानसून में बिगड़ती है, और कई जगह तो पहली ही बारिश में सड़कें उखड़ जाती हैं,” अदालत ने कहा।

इन याचिकाओं में महाराष्ट्र भर में गड्ढों और खुले मैनहोल के कारण बढ़ती मौतों और दुर्घटनाओं की संख्या को उजागर किया गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट ने एक मुआवज़ा और जवाबदेही तंत्र लागू करने के लिए यह सख्त आदेश दिया।

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