‘अभियोजन के मामले की उत्पत्ति रहस्य में घिरी’: सुप्रीम कोर्ट ने मां की हत्या के दोषी को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक व्यक्ति को बरी कर दिया जिसे अपनी मां की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन के मामले की उत्पत्ति और आधार “रहस्य” में घिरे हुए हैं और पूरा मामला कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका है।

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के जुलाई 2013 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें आरोपी की सजा को बरकरार रखा गया था। ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में दो आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने सह-आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन अपीलकर्ता की सजा को कायम रखा था।

अभियोजन के अनुसार, मृतका का अंतिम संस्कार जल्दबाजी में किया गया था। आरोप लगाया गया कि शव को चिता से इसलिए उतारा गया क्योंकि गले पर गला घोंटने के निशान और सिर के पीछे चोट के निशान पाए गए थे। पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था।

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पीठ ने कहा, “अभियोजन के मामले की उत्पत्ति और स्वरूप रहस्य में घिरे हुए हैं।” अदालत ने चार अभियोजन गवाहों, जिनमें कुछ पुलिस अधिकारी भी शामिल थे, की गवाही का उल्लेख किया, जो 22 जुलाई 2010 की सुबह कथित पहले दाह संस्कार के प्रयास वाले स्थान पर पहुंचे थे।

न्यायालय ने कहा कि इतने लोगों की भीड़ मौजूद होने के बावजूद किसी की पहचान नहीं की गई और न ही किसी को गवाह के रूप में अदालत में पेश किया गया। पीठ ने टिप्पणी की, “हमारे मन में यह प्रश्न बना रहता है कि उस समय, स्थान और घटना से आगे की कोई जांच क्यों नहीं की गई और यह क्यों नहीं देखा गया कि दाह संस्कार किसने आयोजित किया था।”

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अदालत ने जांच एजेंसियों की लापरवाही पर चिंता जताई। उसने कहा, “पहले कथित दाह संस्कार प्रयास के समय इकट्ठा हुई और फिर बिखर गई भीड़ की जांच न होना समझ से परे है।”

मेडिकल साक्ष्य भी स्पष्ट नहीं थे। अदालत ने कहा कि चिकित्सकीय राय निश्चित नहीं थी और विशेषज्ञ की गवाही में काफी अस्पष्टता थी। “आत्महत्या की संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता,” पीठ ने कहा।

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि मृतका सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित थीं। इसके लिए लातूर के एक अस्पताल द्वारा 26 सितंबर 1989 को जारी प्रमाण पत्र पेश किया गया।

अभियोजन ने दावा किया था कि आरोपी ने संपत्ति के लिए अपनी मां की हत्या की। अदालत ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा, “जब अभियोजन ने मकसद का मामला पेश किया है, तो वह इसे साबित करने में बुरी तरह विफल रहा है। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि अपीलकर्ता के पिता और दो बहनें जीवित हैं।”

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अदालत ने कहा, “यह मानने का कोई कारण नहीं है कि मृतका की मृत्यु के बाद संपत्ति तुरंत अपीलकर्ता को मिल जाती, यदि कथित हत्या बिना पकड़े रह जाती।”

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने में गंभीर गलती की। पीठ ने कहा, “निचली अदालतों ने साक्ष्यों के आधार पर अपीलकर्ता को दोषी ठहराने में गंभीर त्रुटि की है।”

अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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