दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 वर्षीय अविवाहित महिला को 22 सप्ताह से अधिक गर्भपात की अनुमति दी, कहा- जारी रखने से बढ़ेगा आघात और सामाजिक कलंक

दिल्ली हाई कोर्ट ने 30 वर्षीय अविवाहित महिला को 22 सप्ताह की कानूनी सीमा पार कर चुके गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी है। अदालत ने कहा कि महिला को गर्भ जारी रखने के लिए बाध्य करना न केवल उसके मानसिक और शारीरिक आघात को गहरा करेगा, बल्कि उसे सामाजिक कलंक का भी सामना करना पड़ेगा।

न्यायमूर्ति रवींद्र दूडेज़ा ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला को जबरन गर्भ धारण करने के लिए मजबूर करना उसके घावों को और गहरा करेगा और उसके ठीक होने की प्रक्रिया में बाधा डालेगा।

“अदालत का मत है कि पीड़िता की पीड़ा को और नहीं बढ़ाया जा सकता यदि उसे गर्भ जारी रखने के लिए बाध्य किया जाए। इसके अतिरिक्त, पीड़िता को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ेगा, जिससे उसके शरीर पर हुए अपमान के निशान भरने में बाधा आ सकती है,” आदेश में कहा गया।

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याचिकाकर्ता का आरोप है कि वह पिछले दो वर्षों से एक व्यक्ति के साथ शादी का झूठा वादा करके लिव-इन संबंध में रह रही थी। वर्ष 2024 के अंत में वह गर्भवती हुई, लेकिन उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। जून 2025 में वह फिर गर्भवती हुई और जब उसने पुनः गर्भपात कराने से इनकार किया, तो आरोपी ने 15 मई को उस पर हमला किया और बाद में उसे छोड़ दिया।

इसके बाद महिला ने शिकायत दर्ज कराई, जिस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत बलात्कार, चोट पहुँचाने और आपराधिक धमकी देने सहित प्रावधानों में एफआईआर दर्ज की गई।

एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट में कहा गया कि महिला गर्भपात के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट है।

गौरतलब है कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति है। वर्ष 2021 में संशोधन के बाद, कुछ श्रेणियों की महिलाओं—जैसे यौन शोषण की पीड़िताओं—को 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति मिल सकती है, बशर्ते चिकित्सा बोर्ड इसकी अनुमति दे। 24 सप्ताह से अधिक की स्थिति में न्यायालय असाधारण परिस्थितियों, जैसे भ्रूण में गंभीर विकृतियाँ या महिला के जीवन व स्वास्थ्य पर खतरे, में गर्भपात की अनुमति दे सकता है।

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तथ्यों पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने महिला को गर्भपात की अनुमति दी और स्पष्ट किया कि उसकी गरिमा, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के अधिकार कानूनी सीमा से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका प्रजनन अधिकारों की व्याख्या को समय के साथ और अधिक संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ा रही है, विशेषकर उन मामलों में जहाँ महिला शोषण और दबाव का शिकार रही हो।

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