बिजली क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन से निपटने के लिए सभी हितधारकों को एक मंच पर लाना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बिजली उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए सभी संबंधित हितधारकों को एक साझा मंच पर आकर योजना बनानी और उसे लागू करनी होगी। कोर्ट ने ऊर्जा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) के साथ एक संयुक्त बैठक बुलाए।

न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने 22 जुलाई को पारित आदेश में कहा, “बिजली उत्पादन से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए यह आवश्यक है कि सभी हितधारक एक मंच पर आकर योजनाबद्ध और समन्वित तरीके से कार्य करें, ताकि अल्पकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।”

यह आदेश राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के एक आदेश से संबंधित याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किया गया। एनजीटी ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पर्यावरणीय मंजूरी देने से पहले परियोजनाओं के जलवायु प्रभाव का आकलन करने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग को पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी किया है और ऊर्जा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह इन दोनों एजेंसियों के साथ मिलकर एक संयुक्त हलफनामा दाखिल करे। इस हलफनामे में मौजूदा कानूनी ढांचे और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए बनाई गई कार्य योजना का विवरण होना चाहिए। अदालत ने यह हलफनामा चार हफ्तों के भीतर दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को तय की है।

पीठ ने 21 फरवरी 2025 को पारित अपने एक आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन आज के समय की सबसे गंभीर वैश्विक समस्या बन चुकी है, जो केवल पर्यावरणीय क्षति तक सीमित नहीं है, बल्कि अत्यधिक तापमान, अनिश्चित मौसम और बाढ़, सूखा, हीटवेव जैसे चरम मौसमी घटनाओं का कारण बन रही है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अब यह आवश्यक हो गया है कि नीति निर्माता, नियामक संस्थाएं और बिजली उत्पादन, वितरण और प्रसारण से जुड़े सभी विभाग जमीनी हकीकत को समझते हुए एकजुट होकर काम करें।

सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी और केंद्र सरकार द्वारा दाखिल लिखित दलीलों में विभिन्न क्षेत्रों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन का विवरण दिया गया, जिसमें निर्माण क्षेत्र से 30%, बिजली उत्पादन से 8%, और पराली जलाने से 3% उत्सर्जन होने की बात कही गई।

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इसके साथ ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा भी एक हलफनामा दाखिल किया गया है, जिसमें बिजली क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का उल्लेख किया गया है।

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