जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ कैश बरामदगी मामले में 145 लोकसभा और 63 राज्यसभा सांसदों ने महाभियोग याचिका दायर की

सोमवार को संसद में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब लोकसभा के 145 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की औपचारिक याचिका दाखिल की। यह कदम उस सनसनीखेज विवाद के बाद उठाया गया है, जिसमें वर्मा के आधिकारिक आवास से जली हुई नकदी की गड्डियां बरामद हुई थीं।

संविधान के अनुच्छेद 124(4) या 217 के तहत किसी जज को हटाने के लिए कम से कम 100 लोकसभा सांसदों या 50 राज्यसभा सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। अब यह फैसला लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति लेंगे कि इस प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या खारिज।

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पुष्टि की कि 100 से अधिक सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने पिछले सप्ताह कहा था कि इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों में व्यापक सहमति बनी हुई है।

जस्टिस वर्मा ने किसी भी प्रकार की गलत आचरण से साफ इनकार किया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित इन-हाउस जांच समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में पाया कि जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का उस स्टोररूम पर सक्रिय नियंत्रण था, जहां नकदी बरामद हुई थी। समिति ने इसे गंभीर दुराचार बताते हुए उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की।

न्यायपालिका में जवाबदेही की बड़ी परीक्षा
इस नकदी कांड ने देशभर में भारी जन और राजनीतिक आक्रोश पैदा कर दिया है। कई लोग इसे भारत में न्यायिक जवाबदेही की एक अहम कसौटी मान रहे हैं।

आगे की प्रक्रिया: संसद में महाभियोग का रास्ता
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217(1)(b) के तहत हाईकोर्ट जज को हटाने की प्रक्रिया वही है जो अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए तय है, और यह जज (जांच) अधिनियम, 1968 में विस्तार से दी गई है।

सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष यह तय करेंगे कि प्रस्ताव स्वीकार किया जाए या नहीं। यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो अध्यक्ष को तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करनी होगी, जिसमें शामिल होंगे:

  • सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज,
  • किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश,
  • और एक प्रख्यात विधिवेत्ता।
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यह समिति आरोपों की जांच कर ठोस आरोप तय करेगी। जस्टिस वर्मा को समिति के सामने अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। यदि समिति की रिपोर्ट में जज को दुराचार या अक्षमता का दोषी पाया जाता है, तो प्रस्ताव को लोकसभा में बहस और मतदान के लिए रखा जाएगा।

इस प्रस्ताव के पारित होने के लिए विशेष बहुमत जरूरी होगा — सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान कर रहे सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत का समर्थन। अगर लोकसभा में प्रस्ताव पारित होता है, तो यह राज्यसभा में जाएगा, जहां इसे समान विशेष बहुमत से पारित करना होगा। अंत में यह राष्ट्रपति के पास अंतिम आदेश के लिए भेजा जाएगा।

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