सुप्रीम कोर्ट का फैसला:दिव्यांग कैदियों के लिए जेलों को सुलभ बनाने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु की जेलों में दिव्यांग कैदियों की पहचान और उनके लिए अनुकूल सुविधाएं सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि सभी जेल परिसरों को दिव्यांगजनों के लिए सुलभ बनाया जाना अनिवार्य है।

पीठ ने कहा, “यह अदालत उन दिव्यांग व्यक्तियों की दुर्दशा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करती है जो न्याय प्रणाली में सबसे अधिक उपेक्षित और संवेदनशील समूहों में से हैं। समाज में मौजूद सामाजिक और संरचनात्मक बाधाएं जेलों के भीतर और अधिक गंभीर हो जाती हैं।”

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देश:

  • हर कैदी को जेल में दाखिले के समय अपनी विकलांगता की जानकारी देने और विशेष आवश्यकताओं को बताने का अवसर दिया जाए।
  • जेल के सभी नियम, निर्देश और आवश्यक सूचनाएं ब्रेल, बड़े अक्षरों, सांकेतिक भाषा और सरल भाषा में उपलब्ध कराई जाएं।
  • सभी जेल परिसरों में व्हीलचेयर-अनुकूल स्थान, सुलभ शौचालय, रैंप और संवेदनशील वातावरण उपलब्ध हों।
  • फिजियोथेरेपी, साइकोथेरेपी और अन्य उपचारात्मक सेवाओं के लिए अलग स्थान बनाए जाएं।
  • जेल के चिकित्सा अधिकारियों को दिव्यांगजनों के अधिकारों पर विशेष प्रशिक्षण दिया जाए, और नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
  • प्रत्येक दिव्यांग कैदी को उसकी स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुसार पौष्टिक और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त भोजन दिया जाए।
  • जीवन रक्षक उपचार जैसे नियमित फिजियोथेरेपी और साइकोथेरेपी सेवाएं जेल परिसर में या सरकारी अस्पतालों से लिंक करके उपलब्ध कराई जाएं।
  • तमिलनाडु की सभी जेलों का छह महीने के भीतर सामाजिक कल्याण विभाग, विकलांगजन कल्याण विभाग और प्रमाणित एक्सेस ऑडिटरों की एक विशेषज्ञ समिति द्वारा व्यापक ऑडिट कराया जाए। इसके बाद नियमित ऑडिट कराए जाएं।
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मामले की पृष्ठभूमि

यह आदेश अधिवक्ता एल. मुरुगनाथम द्वारा दायर याचिका पर आया, जो बेकर मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी से पीड़ित हैं। उन्हें एक भूमि विवाद से संबंधित आपराधिक मामले में जेल भेजा गया था और मद्रास हाई कोर्ट ने उन्हें ₹5 लाख का मुआवजा दिया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जेलों में दिव्यांगों की दुर्दशा की ओर ध्यान दिलाया।

अदालत ने यह भी कहा कि जहां महिला कैदियों के लिए न्यूनतम सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, वहीं दिव्यांग और ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए कोई स्पष्ट नीति या कानूनी ढांचा नहीं है।

जवाबदेही और अनुपालन

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के कारागार महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर राज्य मानवाधिकार आयोग के समक्ष एक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करें, जिसमें सभी उठाए गए कदमों का उल्लेख हो।

साथ ही, राज्य कारागार नियमावली की समीक्षा कर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) और संयुक्त राष्ट्र विकलांगजन अधिकार कन्वेंशन (UNCRPD) के अनुरूप संशोधन करने के निर्देश भी दिए गए।

संविधान और मानवाधिकार के आधार पर निर्देश

पीठ ने स्पष्ट किया, “ये निर्देश सार्वजनिक हित में जारी किए जा रहे हैं ताकि जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों की गरिमा और स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा की जा सके। ये निर्देश भारत के संवैधानिक प्रावधानों, वैधानिक दायित्वों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों से प्रेरित हैं।”

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