दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को राजधानी में सार्वजनिक शौचालयों के रखरखाव को लेकर नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों की तीखी आलोचना की और इसे “पूरी तरह से उदासीनता और असंवेदनशीलता” का उदाहरण बताया। अदालत ने इस स्थिति को “पीड़ादायक और अफसोसनाक” करार दिया।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ जन सेवा वेलफेयर सोसायटी नामक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में दिल्ली नगर निगम (MCD), नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को स्वच्छ, जल और बिजली से युक्त कार्यशील सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध कराने के निर्देश देने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने राजधानी के विभिन्न हिस्सों में स्थित सार्वजनिक शौचालयों की बदहाल स्थिति को दर्शाती तस्वीरें पेश कीं। तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि संबंधित निकायों ने सिर्फ लापरवाही ही नहीं, बल्कि “कर्तव्य की घोर उपेक्षा” की है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों जैसे कि एमसीडी, डीडीए और एनडीएमसी ने सार्वजनिक सुविधाओं के रखरखाव के मामले में पूरी तरह से उदासीनता, असंवेदनशीलता और कर्तव्य का उल्लंघन प्रदर्शित किया है।” पीठ ने यह भी कहा कि ऐसी लापरवाही खासकर महिलाओं के लिए गंभीर समस्याएं उत्पन्न करती है, जिन्हें शौचालय की अनुपलब्धता से अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जिन शौचालयों की तस्वीरें पेश की गईं, उनकी हालत राजधानी के अन्य हिस्सों की वास्तविक स्थिति को भी दर्शा सकती है। “इन निकायों को बार-बार यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि कानून के तहत पर्याप्त सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है,” कोर्ट ने कहा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये निकाय जनता के पैसे से संचालित होते हैं और इनका अस्तित्व जनहित के लिए है। कोर्ट के पिछले निर्देशों के जवाब में नगर निकायों ने अब तक उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए स्थिति रिपोर्ट दाखिल की थी, लेकिन पीठ ने उन्हें अपर्याप्त मानते हुए कहा कि अब यह मुद्दा “सर्वोच्च स्तर” पर ले जाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने एमसीडी, डीडीए और एनडीएमसी को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ अध्ययन पर आधारित समग्र योजना तैयार करें, जिससे सार्वजनिक शौचालयों की दीर्घकालिक सफाई और कार्यक्षमता सुनिश्चित की जा सके। साथ ही, तस्वीरों में दिखाए गए शौचालयों की तत्काल मरम्मत का भी आदेश दिया गया।
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने नगर निकायों को अपनी पूर्व में दिए गए उस निर्देश की याद दिलाई जिसमें नागरिक सुविधाओं से संबंधित शिकायतों के निवारण हेतु एकीकृत मोबाइल ऐप विकसित करने को कहा गया था।
अब यह मामला आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है और अदालत अपने निर्देशों के अनुपालन की निगरानी करती रहेगी।