बारिश में केईएम अस्पताल में जलभराव पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी, BMC से मांगा समाधान

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को मुंबई में हुई भारी बारिश के दौरान सरकारी केईएम अस्पताल में जलभराव की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को निर्देश दिया कि वह अस्पताल का तुरंत निरीक्षण करे और समाधान के उपाय सुझाए।

न्यायमूर्ति गौरी गोडसे और न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन की अवकाश पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें राज्य संचालित अस्पतालों की बदहाल हालत का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष मीडिया रिपोर्ट पेश कीं, जिनमें केईएम अस्पताल के गलियारों में मरीजों को टखने तक भरे पानी में बैठा दिखाया गया था। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि MRI कक्षों तक में पानी भर गया था।

पीठ ने कहा, “यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है। अस्पताल में पानी भरना बेहद चिंताजनक है। कोई न कोई समाधान निकालना ही होगा।” अदालत ने अस्पताल की प्रतिष्ठा को याद करते हुए कहा, “केईएम कभी देश का शीर्ष अस्पताल हुआ करता था। देशभर से लोग यहां इलाज के लिए आते थे। अब स्थिति देखिए। प्रबंधन को ऐसा जलभराव बिल्कुल भी नहीं होने देना चाहिए। अस्पताल स्वच्छ और साफ होना चाहिए।”

यह मामला एडवोकेट मोहित खन्ना द्वारा उठाया गया, जिन्हें 2023 में अदालत द्वारा नांदेड़ और छत्रपति संभाजीनगर के सरकारी अस्पतालों में हुई शिशुओं की मौत के मामले में ‘एमिकस क्यूरी’ (अदालत के मित्र) नियुक्त किया गया था। खन्ना ने बताया कि बारिश के बाद मरीजों को गंभीर असुविधा का सामना करना पड़ा और आने वाले मानसून को देखते हुए तत्काल समाधान जरूरी है।

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सरकारी वकील पी.पी. ककड़े ने अदालत को बताया कि अस्पताल निम्न भूभाग में स्थित है, इसलिए वहां पानी भर गया। इस पर कोर्ट ने कहा कि यह कोई उचित कारण नहीं हो सकता और राज्य स्वास्थ्य विभाग से जवाब तलब किया।

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कोर्ट ने BMC अधिकारियों को अस्पताल का निरीक्षण करने और आवश्यक उपाय सुझाने का निर्देश दिया है। साथ ही महाराष्ट्र सरकार और BMC दोनों से कहा गया है कि वे 16 जून को अगली सुनवाई से पहले हलफनामा दाखिल कर बताएं कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति पर शुरू की गई व्यापक न्यायिक निगरानी का हिस्सा है, जो पहले भी सरकारी अस्पतालों में लापरवाही से हुई मौतों और संसाधनों की कमी को लेकर सक्रिय रहा है।

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