सीजेआई गवई ने जस्टिस बेला त्रिवेदी के लिए विदाई समारोह न करने पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशनों की आलोचना की

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक असामान्य और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) द्वारा सेवानिवृत्त हो रहीं न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी के लिए परंपरागत विदाई समारोह आयोजित न करने के निर्णय पर सार्वजनिक रूप से असंतोष प्रकट किया।

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त होते हुए जजों के लिए बार एसोसिएशन द्वारा 4:30 बजे होने वाले विदाई समारोह एक पुरानी परंपरा रही है। लेकिन न्यायमूर्ति त्रिवेदी के लिए इस बार ऐसा कोई समारोह घोषित नहीं किया गया।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने न्यायमूर्ति एजी मसीह के साथ आयोजित औपचारिक पीठ की अध्यक्षता करते हुए न्यायमूर्ति त्रिवेदी के सेवानिवृत्त दिवस पर कहा,
“मैं श्री सिब्बल और रचना श्रीवास्तव का आभारी हूं कि वे दोनों उपस्थित हैं। लेकिन एसोसिएशन (SCBA) द्वारा लिया गया रुख, मैं खुलकर कहूंगा, निंदा योग्य है, क्योंकि मैं स्पष्टता में विश्वास रखता हूं। ऐसे अवसरों पर ऐसा रुख नहीं अपनाया जाना चाहिए था।”

उन्होंने SCBA अध्यक्ष कपिल सिब्बल और उपाध्यक्ष रचना श्रीवास्तव की उपस्थिति की सराहना की और कहा,
“यहां उपस्थित संपूर्ण जनसमूह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वे (न्यायमूर्ति त्रिवेदी) एक अत्यंत उत्कृष्ट जज रही हैं।”
सीजेआई गवई ने यह भी कहा कि न्याय शैली में भिन्नता विदाई सम्मान का आधार नहीं हो सकती।

न्यायमूर्ति त्रिवेदी को उन्होंने “दृढ़ता, निर्भीकता, परिश्रम, ईमानदारी और आध्यात्मिकता” की मिसाल बताया और कहा कि ऐसी परंपराएं निभाई जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति एजी मसीह ने भी सीजेआई की बातों का समर्थन करते हुए इसे “अजीब” स्थिति बताया और संस्थागत परंपराओं के पालन पर बल दिया।
“मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा है, मैं उसे दोहराना नहीं चाहता था, लेकिन कहना पड़ेगा कि परंपराएं बनी रहनी चाहिए और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि अच्छी परंपराएं आगे भी जारी रहेंगी,” उन्होंने कहा।

न्यायमूर्ति मसीह ने न्यायमूर्ति त्रिवेदी को “स्नेह की प्रतीक” बताते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं और कहा कि वे आगे भी मार्गदर्शक बनी रहेंगी।

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उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी अगस्त 2021 में सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनी थीं। इससे पहले वे गुजरात और राजस्थान हाईकोर्ट की न्यायाधीश रह चुकी हैं और न्यायिक सेवा में भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुकी हैं। उनका अंतिम कार्यदिवस अब न्यायपालिका की परंपराओं और संस्थागत शिष्टाचार को लेकर नए विमर्श का कारण बन गया है।

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