दिल्ली हाईकोर्ट ने नमो भारत स्टेशन के पास ढांचों को गिराने पर रोक लगाने से इनकार किया, RRTS को बताया ‘अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजना’

दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी के सराय काले खां स्थित नमो भारत मेट्रो रेल स्टेशन के पास लगाए गए स्टॉल और खोखों को हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) कॉरिडोर एक अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजना है।

82 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर दिल्ली और मेरठ के बीच यात्रा समय को घटाकर एक घंटे से भी कम करने के उद्देश्य से बनाया जा रहा है। परियोजना का कार्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (NCRTC) द्वारा किया जा रहा है।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि जनवरी 2018 में स्टॉल मालिकों को जारी किए गए ‘ठेहबाज़ारी’ प्रमाणपत्र अस्थायी थे। अदालत ने स्टॉल संचालकों को अपना सामान हटाने और स्थल खाली करने का निर्देश दिया।

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अदालत उन दो स्टॉल धारकों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिन्होंने सराय काले खां के उस्ताद हाफिज अली खान साहिब मार्ग पर अपने स्टॉलों के ध्वस्तीकरण को रोकने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 6 मई को NCRTC द्वारा की गई यह कार्रवाई बिना पूर्व सूचना के की गई, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

कोर्ट ने आदेश में कहा, “निर्माण कार्य दुकानों के आस-पास ही किया जा रहा है और वास्तव में याचिकाकर्ताओं के स्टॉल विकास कार्य में बाधा बन रहे हैं। RRTS लाइन एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजना है जिसे NCRTC द्वारा निष्पादित किया जा रहा है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “जब ठेहबाज़ारी परमिट स्वयं अस्थायी है और RRTS परियोजना जनहित में है, तो याचिकाकर्ता यह तर्क नहीं दे सकते कि उन्हें हटाया नहीं जा सकता।”

हालांकि, अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं को किसी वैकल्पिक स्थान की मांग पर दो माह के भीतर विचार कर निर्णय लें।

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एमसीडी के वकील ने भी अदालत को बताया कि ठेहबाज़ारी परमिट स्वभावतः अस्थायी होते हैं। वहीं, NCRTC के वकील ने कहा कि नमो भारत मेट्रो रेल स्टेशन का पुनर्विकास कार्य सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत RRTS लाइन परियोजना का हिस्सा है। स्टॉलों का ध्वस्तीकरण चल रहे विकास कार्य के लिए आवश्यक है।

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