सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को राजनीतिक दल बनाने से रोकने पर निर्णय टाला

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन दोषसिद्ध व्यक्तियों को राजनीतिक दल बनाने या उनका नेतृत्व करने से रोकने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) की अंतिम सुनवाई को टाल दिया। प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने इस सुनवाई की अगली तारीख 11 अगस्त तय की है।

यह जनहित याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा 2017 में दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि दोषसिद्ध व्यक्तियों को अयोग्यता की अवधि के दौरान राजनीतिक दलों के पदाधिकारी बनने से रोका जाए। पीठ ने पहले भी दोषी व्यक्तियों की चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की शुचिता पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी।

प्रधान न्यायाधीश खन्ना, जो 13 मई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, ने इस मामले में निर्णय सुरक्षित रखने से इनकार करते हुए सुनवाई को स्थगित करने का निर्देश दिया। अदालत ने संबंधित सभी पक्षों से कहा है कि वे पुनर्निर्धारित सुनवाई से पहले अपने लिखित तर्क प्रस्तुत करें।

पूर्व की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्तियों ने इस विरोधाभास पर सवाल उठाया था कि जब दोषियों को चुनाव लड़ने से रोका गया है, तो उन्हें उम्मीदवारों के चयन और पार्टी नेतृत्व में भूमिका निभाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है। अदालत ने पूछा था, “लोकतंत्र की पवित्रता को कैसे बनाए रखा जा सकता है?”

याचिका में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है, जो चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों का पंजीकरण करने का अधिकार देती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान “मनमाना, तर्कहीन और संविधान के विरुद्ध” है और चुनाव आयोग को दलों के पंजीकरण के साथ-साथ उनके निष्पंजीकरण का भी अधिकार मिलना चाहिए।

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इसके अतिरिक्त, याचिका में चुनाव आयोग से निर्वाचन प्रणाली के अपराधीकरण को रोकने और राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है, जो संविधान के कार्यान्वयन की समीक्षा हेतु गठित राष्ट्रीय आयोग के सुझावों के अनुरूप है।

याचिका में यह चिंताजनक तथ्य भी उजागर किया गया है कि वर्तमान में लगभग 40% विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं या वे दोषसिद्ध हो चुके हैं, जो राजनीतिक शुचिता के मार्ग में एक बड़ी बाधा है और सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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याचिकाकर्ता ने कई प्रमुख नेताओं के उदाहरण भी दिए हैं, जो दोषसिद्धि या मुकदमे का सामना करने के बावजूद महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव बनाए हुए हैं, जिससे भारतीय राजनीति का परिदृश्य और जटिल हो गया है।

इसके अलावा, याचिका में धारा 29ए की न्यूनतम आवश्यकताओं के चलते राजनीतिक दलों की बेतहाशा वृद्धि पर भी चिंता जताई गई है, और 2004 में चुनाव आयोग द्वारा इस धारा में संशोधन के लिए दिए गए प्रस्ताव का उल्लेख किया गया है, ताकि दलों के पंजीकरण की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सके।

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