सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक के खिलाफ POCSO मामला बहाल किया, केरल हाईकोर्ट की ‘असंवेदनशीलता’ पर जताई नाराज़गी

एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एक शिक्षक के खिलाफ बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज मामला फिर से बहाल कर दिया है। कोर्ट ने FIR को रद्द करने के केरल हाईकोर्ट के निर्णय को “असंवेदनशील” करार दिया। उक्त शिक्षक पर 52 छात्राओं के यौन उत्पीड़न का आरोप है, जिसके बाद उसे निलंबित कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हाईकोर्ट की कार्यवाही को इस आधार पर अनुचित बताया कि उसने साक्ष्यों का समय से पहले मूल्यांकन कर एक तरह से ‘मिनी ट्रायल’ चलाया और गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करते हुए निष्कर्ष निकाल लिया कि यौन उद्देश्य की मंशा नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने पीड़ित छात्राओं द्वारा पुलिस को दिए गए प्रारंभिक बयानों को नजरअंदाज कर दिया, जिनमें POCSO अधिनियम के तहत प्रथम दृष्टया अपराध स्पष्ट रूप से झलकते हैं। कोर्ट ने सेक्शन 7 की व्याख्या को भी गलत बताया, जिसमें यौन मंशा न होने का निष्कर्ष हाईकोर्ट ने खुद ही निकाल लिया, जबकि पीड़ितों को पूरी तरह से बयान देने का मौका भी नहीं दिया गया।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यह भी रेखांकित किया कि पीड़ितों में से अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय से थीं, जिससे यह संकेत मिलता है कि आरोपी ने संभवतः सामाजिक कमजोरियों का फायदा उठाकर घटना को छुपाने की कोशिश की। कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि आरोपी ने एक पीड़िता से समझौता कर FIR रद्द कराने की कोशिश की, जो न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास प्रतीत होता है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई को बहाल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पीड़ितों को संरक्षित गवाह माना जाए और उनकी पहचान गोपनीय रखते हुए जल्द से जल्द उनके बयान दर्ज किए जाएं। आरोपी को किसी भी गवाह या पीड़िता से संपर्क करने से सख्ती से रोका गया है।

इसके अतिरिक्त, स्कूल द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में भी गंभीर बातें सामने आईं। कंप्यूटर लैब में आपत्तिजनक सामग्री मिली और शिक्षक द्वारा क्षमा याचना देने के बावजूद अनुचित व्यवहार जारी रहा। अभियोजन पक्ष ने बताया कि आरोपी ने छात्रों या उनके परिजनों के व्हाट्सएप नंबरों पर अश्लील तस्वीरें भेजीं।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया है कि यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों को न्यायिक प्रक्रिया से पूर्व हल्के में नहीं लिया जा सकता और पीड़ितों को न्याय सुनिश्चित किया जाना सर्वोपरि है।

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