‘अनुच्छेद 142 बन गया है न्यूक्लियर मिसाइल’: उपराष्ट्रपति धनखड़ ने राज्य विधेयकों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले पर कड़ी टिप्पणी की, जिसमें राज्यों द्वारा पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति की सहमति देने की समयसीमा तय की गई है। उन्होंने इसे न्यायिक अतिक्रमण का उदाहरण बताते हुए चेतावनी दी कि न्यायपालिका “सुपर संसद” की भूमिका निभा रही है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर संवैधानिक सवाल

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने यह टिप्पणी उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में राज्यसभा के इंटर्न्स के छठे बैच को संबोधित करते हुए की। उन्होंने कहा कि 8 अप्रैल, 2025 को तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह निर्देश देता है कि राष्ट्रपति को राज्य विधेयकों पर कितनी समयावधि में निर्णय लेना होगा। इस पर प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा, “एक हालिया निर्णय में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम किस दिशा में जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है?”

धनखड़ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत न्यायपालिका की भूमिका केवल संविधान की व्याख्या तक सीमित है। उन्होंने कहा, “जिन न्यायाधीशों ने राष्ट्रपति को लगभग मैंडमस जारी कर दिया, वे संविधान की शक्ति को भूल गए हैं।”

‘अनुच्छेद 142 लोकतंत्र पर परमाणु हमला बन गया है’

READ ALSO  किराया खरीद समझौते के आधार पर मोटर वाहन रखने वाला फाइनेंसर यूपी मोटर वाहन कराधान अधिनियम के तहत कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है: सुप्रीम कोर्ट

धनखड़ ने अनुच्छेद 145(3) में सुधार की आवश्यकता जताते हुए कहा कि जब संवैधानिक प्रश्नों पर निर्णय के लिए पीठ गठित की जाती है, तब बहुमत का सिद्धांत लागू होता है। साथ ही उन्होंने अनुच्छेद 142 की तीखी आलोचना करते हुए कहा, “अनुच्छेद 142 एक न्यूक्लियर मिसाइल बन गया है, जो लोकतांत्रिक शक्तियों के विरुद्ध 24×7 न्यायपालिका के पास उपलब्ध है।”

कार्यपालिका के कार्य न्यायपालिका द्वारा करने पर चिंता

धनखड़ ने कहा, “हमारे पास अब ऐसे न्यायाधीश हैं जो कानून बना रहे हैं, कार्यपालिका के कार्य कर रहे हैं, सुपर संसद बन चुके हैं और जिन पर कोई जवाबदेही नहीं है क्योंकि उन पर कानून लागू ही नहीं होता।” उन्होंने यह भी पूछा कि जब न्यायपालिका कार्यपालिका का काम करने लगे तो फिर जनता द्वारा निर्वाचित सरकार की जवाबदेही का क्या होगा।

न्यायिक पारदर्शिता और देरी पर सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के आवास पर कथित रूप से नकद बरामदगी की घटना (14-15 मार्च) का उल्लेख करते हुए धनखड़ ने न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “सात दिन तक किसी को पता नहीं चला। क्या यह देरी स्वीकार्य है? माफ करने योग्य है?”

उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की जानकारी के अनुसार, उस मामले में “culpability” थी, परंतु अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं हुई है। “संविधान केवल राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्रतिरक्षा देता है, फिर न्यायाधीशों को यह विशेष छूट कैसे मिल गई?” उन्होंने सवाल उठाया।

READ ALSO  Supreme Court Permits Yasin Malik to Cross-Examine Witnesses via Video Conferencing

लोकपाल आदेश पर रोक और न्यायिक जांच से बचाव पर चिंता

धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 27 जनवरी 2025 के लोकपाल आदेश पर रोक लगाए जाने की भी आलोचना की, जिसमें हाईकोर्ट के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच की अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ जांच से छूट नहीं है। संस्थान पारदर्शिता से फलते-फूलते हैं, और बिना जांच की गारंटी किसी भी संस्था के पतन का सबसे सुनिश्चित तरीका है।”

READ ALSO  समलैंगिक विवाह: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सराहना की

न्यायिक नियुक्तियों पर संविधान का हवाला

जजों की नियुक्तियों के विषय में धनखड़ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत नियुक्तियां “परामर्श के साथ” की जाती हैं, न कि केवल न्यायपालिका की इच्छा से।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles