सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट को यह सुझाव दिया कि जिन वकीलों की वरिष्ठ अधिवक्ता बनने की याचिकाएं पहले खारिज या स्थगित की गई थीं, उनके मामलों की पुनर्समीक्षा की जाए। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भूयान की पीठ ने कहा कि यह समीक्षा इंदिरा जयसिंह निर्णय में स्थापित सिद्धांतों के अनुसार की जानी चाहिए और इसके लिए हाईकोर्ट को अपनी समिति का पुनर्गठन करना होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने अदालत में पक्ष रखा। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निर्देश दिया कि वे हाईकोर्ट से विचार-विमर्श कर अगली सुनवाई, जो 15 अप्रैल को निर्धारित है, तक एक स्पष्ट योजना के साथ लौटें।
यह मामला नवंबर 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा किए गए वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन से जुड़ा है, जिसमें 70 वकीलों (जिसमें 12 महिलाएं शामिल थीं) को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया था। इस प्रक्रिया को लेकर प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आरोप लगे थे। कुल 300 से अधिक वकीलों ने आवेदन किया था, लेकिन चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे।

जस्टिस ओका ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“हम यह सुझाव दे रहे हैं कि जिन उम्मीदवारों की याचिकाएं स्थगित की गई थीं या खारिज हुई थीं, उनके मामलों की समिति इंदिरा जयसिंह निर्णय के अनुरूप दोबारा समीक्षा करे। इसका मतलब है कि पूरी प्रक्रिया नए सिरे से, नए समिति के साथ शुरू की जाए।”
हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता राव ने यह सुझाव दिया कि शेष आवेदनों पर हाईकोर्ट की फुल कोर्ट बैठक में विचार किया जा सकता है, लेकिन याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि वर्तमान मार्किंग प्रणाली दोषपूर्ण है और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करती है।
इससे पहले 20 फरवरी को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन की पद्धति और मानदंडों पर “गंभीर आत्ममंथन” की आवश्यकता जताई थी। अदालत ने यह सवाल भी उठाया था कि संक्षिप्त साक्षात्कार (interview) से किसी वकील की क्षमता और व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन संभव है या नहीं।
यह मामला न्यायिक नामांकन और मान्यता की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता से जुड़े बड़े मुद्दों को छूता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला अब मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के पास भेजा है, ताकि वे यह निर्णय लें कि क्या वरिष्ठ अधिवक्ता नामांकन से संबंधित याचिकाओं को लेकर विधानिक मंशा (Advocates Act की धारा 16 के तहत) पर विचार के लिए वृहद पीठ का गठन आवश्यक है।