इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ खंडपीठ) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में उत्तर प्रदेश सरकार के एक अधिकारी पर लगाए गए अनुशासनात्मक दंड को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए, किसी बाहरी राय के आधार पर किसी कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता।
यह मामला (रिट – ए नंबर 2211/2025, दिनेश्वर मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य) न्यायमूर्ति आलोक माथुर की एकल पीठ ने निपटाया। अदालत ने पाया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1999 के नियम 9 का उल्लंघन किया, क्योंकि निर्णय लेने में एक ऐसी राय पर विचार किया गया था जो न तो जांच प्रक्रिया का हिस्सा थी और न ही याचिकाकर्ता को दी गई थी। न्यायालय ने कहा कि यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है और इसे अवैध माना जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता दिनेश्वर मिश्रा सहारनपुर में उप गन्ना आयुक्त के पद पर कार्यरत थे, जब उनके खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी “टैगिंग आदेशों” को प्रभावी ढंग से लागू नहीं करने का आरोप लगाया गया। इन आदेशों के तहत चीनी और शीरा बिक्री से प्राप्त 85% राजस्व को गन्ना किसानों को भुगतान करने के लिए उपयोग करना अनिवार्य था। सरकार ने आरोप लगाया कि मिश्रा की लापरवाही के कारण गन्ना किसानों को भुगतान में देरी हुई।
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इस मामले में विभागीय जांच शुरू की गई और 13 सितंबर 2023 को चार आरोपों वाली चार्जशीट जारी की गई। श्री मिश्रा ने इन आरोपों को खारिज किया और जांच प्रक्रिया में भाग लिया। इसके बाद 9 जनवरी 2023 को जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। रिपोर्ट में पाया गया कि वास्तविक गलती जिला गन्ना अधिकारी, शामली की थी, न कि श्री मिश्रा की।
इसके बावजूद, 23 सितंबर 2024 को गन्ना विभाग के प्रमुख सचिव ने “दो वेतन वृद्धियों को स्थायी रूप से रोकने” का दंड लगाया और उनकी सेवा पुस्तिका में प्रतिकूल प्रविष्टि (सेंसर एंट्री) दर्ज कर दी। इससे उनके वेतन वृद्धि पर स्थायी असर पड़ा और उनकी सेवा छवि भी प्रभावित हुई। इस कार्रवाई से आहत होकर, श्री मिश्रा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।
मुख्य कानूनी मुद्दे
हाईकोर्ट ने इस मामले में दो महत्वपूर्ण कानूनी उल्लंघनों पर गौर किया:
1. उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1999 के नियम 9 का उल्लंघन
नियम 9 के अनुसार, यदि अनुशासनात्मक प्राधिकारी किसी कर्मचारी के पक्ष में आई जांच रिपोर्ट से असहमत होता है, तो उसे स्पष्ट रूप से असहमति का कारण बताकर एक नई कारण बताओ नोटिस जारी करनी होती है और कर्मचारी को अपना जवाब देने का पूरा अवसर देना होता है।
हालांकि, इस मामले में, जांच अधिकारी द्वारा श्री मिश्रा को दोषमुक्त करने के बावजूद, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनके नियंत्रण अधिकारी (गन्ना आयुक्त) से एक बाहरी राय मांगी। इस राय में श्री मिश्रा को दोषी ठहराया गया, जबकि जांच रिपोर्ट उन्हें निर्दोष साबित कर चुकी थी।
चौंकाने वाली बात यह थी कि यह नई राय श्री मिश्रा को कभी नहीं दिखाई गई, न ही उन्हें इस पर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।
अदालत ने कहा: “नियम 9 के प्रावधानों में इस प्रकार की राय लेने का कोई स्थान नहीं है” और कोई भी अनुशासनात्मक प्राधिकारी जांच प्रक्रिया के दौरान मौजूद दस्तावेजों से अलग किसी बाहरी रिपोर्ट या राय के आधार पर दंड नहीं दे सकता।
2. प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन
न्याय का एक मूलभूत नियम यह है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई की जा रही है, उसे सभी साक्ष्यों की जानकारी दी जानी चाहिए और उन पर अपनी सफाई देने का अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन इस मामले में, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने श्री मिश्रा को गन्ना आयुक्त की राय के बारे में कभी सूचित नहीं किया और न ही उन्हें इसे चुनौती देने का अवसर दिया।
अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन माना और कहा:
“याचिकाकर्ता को [गन्ना आयुक्त की] राय न देना… स्पष्ट रूप से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।”
हाईकोर्ट का फैसला
मामले की समीक्षा करने के बाद, हाईकोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया और अनुचित तरीके से कार्य किया।
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि “नियम 9 का गंभीर उल्लंघन हुआ है” और पूरी प्रक्रिया “अवैध और मनमानी” थी।
न्यायालय ने 23 सितंबर 2024 को पारित दंड आदेश को रद्द कर दिया, जिसका मतलब यह हुआ कि प्रतिबंधित वेतन वृद्धि और प्रतिकूल प्रविष्टि अब अमान्य हो गई।
हालांकि, अदालत ने मामले को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया। इसके बजाय, मामले को अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास पुनर्विचार के लिए भेज दिया, लेकिन निर्देश दिया कि यह पुनर्मूल्यांकन सिर्फ जांच अधिकारी की रिपोर्ट के बाद के चरण से शुरू होना चाहिए।
अगर विभाग फिर से कार्यवाही करना चाहता है, तो उसे पूरी तरह से उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
अदालत ने यह भी सख्ती से कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी पहले रद्द किए गए दंड आदेश से प्रभावित हुए बिना नए सिरे से विचार करे।
इसके अलावा, न्यायाधीश ने आदेश दिया कि मामले का निपटारा जल्द से जल्द, अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर किया जाए।
न्यायालय के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक कार्यवाहियों में निष्पक्षता को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
- नियम 9 के उल्लंघन पर: “नियम 9 के प्रावधानों में इस प्रकार की राय लेने का कोई स्थान नहीं है… अनुशासनात्मक प्राधिकारी किसी तीसरे व्यक्ति की राय लेकर दंड नहीं दे सकता।”
- प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर: “याचिकाकर्ता को [गन्ना आयुक्त की] राय न देना… स्पष्ट रूप से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।”
- अनुशासनात्मक कार्यवाही की अवैधता पर: “नियम 9 का गंभीर उल्लंघन हुआ है… और यह अदालत मानती है कि इस प्रकार की कार्यवाही अवैध और मनमानी है, इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।”