ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एम्स (AIIMS) से मांगी विशेषज्ञ राय

सुप्रीम कोर्ट ने किसी मरीज को ‘ब्रेन डेड’ घोषित करने की मौजूदा प्रक्रिया की समीक्षा करने और उसे अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के विशेषज्ञों से इस संबंध में सुझाव और रिपोर्ट देने को कहा है।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केरल हाईकोर्ट के 2017 के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार किया। याचिकाकर्ता ने ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया में संभावित गड़बड़ियों और पुख्ता सबूतों की कमी का मुद्दा उठाया है।

अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वर्तमान प्रोटोकॉल में कुछ ऐसी कमियां हैं जिन्हें दूर किया जाना आवश्यक है ताकि किसी भी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने से पहले पूरी तरह सुनिश्चित हुआ जा सके। याचिकाकर्ता के अनुसार, ब्रेन डेड वह स्थिति है जब मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाती है।

इस स्थिति को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने सुझाव दिया कि एंजियोग्राफी और ईईजी (EEG) जैसे परीक्षणों को अनिवार्य किया जाना चाहिए। ईईजी टेस्ट के जरिए मस्तिष्क की इलेक्ट्रिकल गतिविधि को मापा जाता है, जिससे यह साफ हो सके कि दिमाग काम कर रहा है या नहीं।

बेंच ने याचिकाकर्ता की दलीलों को सुनने के बाद उन्हें अपने सभी सुझाव लिखित रूप में सौंपने का निर्देश दिया। अदालत का इरादा इन तकनीकी सुझावों की व्यवहारिकता की जांच देश के शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञों से कराने का है।

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सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, “हम एम्स (AIIMS) के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख से अनुरोध करेंगे कि वे एक समिति का गठन करें और आपके द्वारा दिए गए सुझावों पर हमें अपनी रिपोर्ट या टिप्पणी दें।”

यह कदम राष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सा दिशानिर्देशों में बदलाव का आधार बन सकता है, जिससे अंगों के दान या लाइफ सपोर्ट हटाने जैसी गंभीर प्रक्रियाओं में उच्च स्तरीय पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी।

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यह मामला 2017 के केरल हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि ब्रेन डेड घोषित करने में बरती जाने वाली लापरवाही को रोकने के लिए पर्याप्त निर्देश नहीं दिए गए थे। अब सुप्रीम कोर्ट एम्स के जरिए कानूनी और चिकित्सा मानकों के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अगली सुनवाई जुलाई में करेगा, तब तक विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने की उम्मीद है।

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