इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कंपनी के डायरेक्टरों के खिलाफ धारा 138 (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट) के तहत चल रही कई आपराधिक कार्यवाहियों को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि यदि चेक जारी करने वाली कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया है, तो केवल डायरेक्टरों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने स्पष्ट किया कि एनआई एक्ट की धारा 141 के तहत डायरेक्टरों पर ‘विकासात्मक दायित्व’ (Vicarious Liability) तभी डाला जा सकता है जब मुख्य अपराधी, यानी कंपनी को मामले में पक्षकार बनाया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर उन याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें चेक बाउंस से संबंधित कई शिकायत मामलों को चुनौती दी गई थी। इनमें राजीव गुप्ता और संतोष कुमार बाजपेई द्वारा दायर याचिकाएं शामिल थीं।
शिकायत के अनुसार, ‘अप्रोच एडवरटाइजिंग एंड एग्जीबिटर्स प्राइवेट लिमिटेड’ नामक फर्म ने आरोपी कंपनी के उत्पादों का विज्ञापन किया था। भुगतान के बदले में आरोपी कंपनी ने चेक जारी किए थे, जिनमें से एक लाख रुपये का चेक 30 अक्टूबर 2011 को बैंक में ‘अपर्याप्त धनराशि’ के कारण बाउंस हो गया। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजे गए, लेकिन भुगतान न होने पर एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत मामला दर्ज कराया गया। निचली अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए समन जारी किए थे, जिन्हें हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
आवेदकों के तर्क
राजीव गुप्ता के वकील ने तर्क दिया कि वह केवल ‘मैसर्स स्लिम केयर हर्बल प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड’ के डायरेक्टर थे। बचाव पक्ष का कहना था कि विज्ञापन के लिए पहले ही काफी भुगतान किया जा चुका था जिसे शिकायतकर्ता ने छिपाया।
सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यह उठाया गया कि शिकायत में एक मौलिक दोष है—चेक जारी करने वाली कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया था। एनआई एक्ट की धारा 141 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि अपराध कंपनी द्वारा किया गया है, तो कंपनी के साथ-साथ उसके संचालन के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर ही मुकदमा चलाया जाना चाहिए। आवेदकों ने ‘अनीता हाडा बनाम गॉडफादर ट्रेवल्स एंड टूर्स प्राइवेट लिमिटेड (2012)’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि डायरेक्टरों पर मुकदमा चलाने से पहले कंपनी को आरोपी बनाना अनिवार्य है।
शिकायतकर्ता और राज्य की दलीलें
शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि विज्ञापन सेवाओं के लिए बकाया राशि स्वीकार करते हुए एक समझौता (MOU) किया गया था। यह भी तर्क दिया गया कि नोटिस राजीव गुप्ता को कंपनी के डायरेक्टर के रूप में भेजा गया था, जिसका अर्थ है कि कंपनी को प्रभावी रूप से सूचित कर दिया गया था।
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि चूंकि आवेदक मैनेजिंग डायरेक्टर थे और कंपनी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, इसलिए उन पर दायित्व बनता है। शिकायतकर्ता ने ‘भूपेश राठौड़ बनाम दयाशंकर प्रसाद चौरसिया (2022)’ के मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल तकनीकी कमियों के आधार पर न्याय में बाधा नहीं आनी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने एनआई एक्ट की धाराओं और सुप्रीम कोर्ट के ‘अनीता हाडा’ फैसले का गहराई से विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को उद्धृत किया, जिनमें कहा गया था:
“कंपनी द्वारा अपराध का किया जाना अन्य लोगों के विकासात्मक दायित्व को आकर्षित करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा था कि अधिनियम की धारा 141 के तहत मुकदमा जारी रखने के लिए कंपनी को आरोपी के रूप में पेश करना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में कंपनी को न तो पक्षकार बनाया गया और न ही उसे एक कानूनी इकाई के रूप में नोटिस दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 141 केवल तभी ‘विकासात्मक दायित्व’ पैदा करती है जब अपराध करने वाली कंपनी पर भी उसके प्रबंधन के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों के साथ मुकदमा चलाया जाए।
हाईकोर्ट का निर्णय
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आवेदकों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा:
“आवेदकों के खिलाफ दायर शिकायतें टिकने योग्य नहीं हैं क्योंकि कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया है और आवेदकों पर कोई विकासात्मक दायित्व नहीं थोपा जा सकता। आवेदकों के खिलाफ उनकी व्यक्तिगत क्षमता में कार्यवाही नहीं की जा सकती क्योंकि चेक कंपनी द्वारा जारी किए गए थे।”
नतीजतन, हाईकोर्ट ने धारा 482 की अर्जियों को स्वीकार करते हुए लखनऊ की ट्रायल अदालतों में लंबित सभी संबंधित आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता बकाया राशि की वसूली के लिए कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपचारों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है।
केस विवरण:
- केस का नाम: राजीव गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (तथा संबंधित मामले)
- केस संख्या: आवेदन धारा 482 संख्या 4766/2012
- पीठ: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
- तारीख: 11 मार्च, 2026

